जनप्रवाद ब्यूरो, टीम। इस्लामाबाद वार्ता फेल होने के बावजूद पाकिस्तान खुद को शाबाशी दे रहा है। वार्ता के फेल होने से फिर भीषण युद्ध की संभावना बढ़ गई है। दूसरी ओर रिपोर्ट से पता चला है कि ईरान युद्ध से अमेरिका को बड़ा झटका लगा है। वह वैश्विक ताकत की रेस में कमजोर हो चुका है। इसका कई मोर्चों पर असर हुआ है। इससे चीन-रूस को फायदा हुआ है।
21 घंटों तक चली शांति वार्ता
अमेरिका-ईरान के बीच इस्लामाबाद में 21 घंटों तक चली शांति वार्ता बेनतीजा रही। इस कूटनीतिक प्रयास के विफल होने के साथ ही पश्चिम एशिया में संकट गहराने की संभावना बढ़ गई है। शांति वार्ता असफल होने के बाद से अमेरिका-इस्राइल के एक बार फिर से आक्रामक रुख अपनाने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। बैठक खत्म होने के बाद अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने कहा कि हम किसी समझौते पर नहीं पहुंच पाए हैं। मुझे लगता है कि यह अमेरिका से ज्यादा ईरान के लिए बुरी खबर है। हमने इसे जितना हो सके उतना स्पष्ट कर दिया है, लेकिन ईरान ने हमारी शर्तों को स्वीकार नहीं किया है। अमेरिका-ईरान के बीच शांति वार्ता बिना किसी नतीजे पर खत्म होने की बड़ी वजह होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण का मुद्दा रहा। ईरान बैठक के दौरान होर्मुज पर अपना नियंत्रण बनाए रखने की मांग पर डटा रहा, जबकि अमेरिका की ओर से इसे पूरी तरह से खोलने की मांग की गई। वार्ता की विफलता की दूसरी वजह परमाणु कार्यक्रम पर अमेरिका की ओर से रोक की मांग रही। ईरान ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। ईरान का स्पष्ट कहना रहा है कि वह परमाणु हथियार नहीं बनाएगा, लेकिन यूरेनियम संवर्धन को नहीं रोकेगा। वहीं, अमेरिका ने मांग की कि ईरान की परमाणु सुविधाओं को नष्ट किया जाए और यूरेनियम भंडार को अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी आईएईए को सौंपा जाए।
ईरान की पूर्व शर्तों के बाद शुरू हुई वार्ता
ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी ने कहा कि त्रिपक्षीय वार्ता ईरान की पूर्व शर्तों के बाद शुरू हुई। जिनमें दक्षिण लेबनान में इजरायली हमलों को रोकना भी शामिल था। ईरान के प्रतिनिधिमंडल ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के साथ बैठक में शर्तें रखीं। इनमें युद्ध के दौरान हुए नुकसान के लिए मुआवजा और अमेरिका-इजरायल की ओर से जब्त की गई ईरानी संपत्तियों को जारी करना शामिल है। शांति वार्ता असफल होने के बाद ईरान ने साफ कर दिया है कि अमेरिका के साथ अगले दौर की वार्ता की फिलहाल कोई योजना नहीं है। इन स्थितियों के हिसाब से पश्चिम एशिया में एक बार फिर से संघर्ष छिड़ने के आसार नजर आने लगे हैं। इनका असर होर्मुज जलडमरूमध्य से लेकर खाड़ी देशों पर हमलों के रूप में सामने आ सकता है। वहीं, अगर दो हफ्तों के युद्धविराम के दौरान अमेरिका-ईरान थोड़ी नरमी अपनाते हैं, तो एक बार फिर से बातचीत की मेज पर आ सकते हैं।
सीखें बघारने से बाज नहीं आया पाकिस्तान
शांति वार्ता विफल होने के बाद भी पाकिस्तान सीखें बघारने से बाज नहीं आया। वार्ता के बाद इशाक डार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस दौरान अपने बयान में उन्होंने कहा कि पाकिस्तान इन शांति वार्ताओं की मेजबानी करके सम्मानित महसूस कर रहा है। डार ने कहा कि ये न सिर्फ मिडिल-ईस्ट बल्कि पूरी दुनिया की स्थिरता के लिए एक अच्छा संकेत है। वहीं अमेरिका और ईरान के बीच हुई शंति वार्ता को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ज्यादा अहमियत नहीं दी। उन्होंने कहा कि किसी भी नतीजे से अमेरिका को फर्क नहीं पड़ता क्योंकि हम जीते हैं। अब अमेरिकी राष्ट्रपति के दावों से उलट रिपोर्ट ने अमेरिका की पोल खोल दी है।
वैश्विक शक्ति संतुलन में नए समीकरण
ईरान युद्ध ने वैश्विक शक्ति संतुलन में नए समीकरण खड़े कर दिए हैं। जहां अमेरिका को कई मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, वहीं चीन और रूस इस स्थिति का रणनीतिक लाभ उठाते नजर आ रहे हैं। आने वाले समय में यह संघर्ष वैश्विक राजनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है। इराक और अफगानिस्तान के लंबे युद्धों के बाद रूस और चीन ने इसी खालीपन का फायदा उठाते हुए क्षेत्र में अपने सैन्य, कूटनीतिक और आर्थिक संबंध मजबूत किए। ट्रंप द्वारा बिना सहयोगी देशों से सलाह के लिए गए फैसलों ने नाटो और अन्य साझेदारों में असंतोष बढ़ाया। इसका लाभ चीन और रूस को मिला, जो पहले से ही अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच बढ़ती दरारों का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे वैश्विक शक्ति संतुलन और जटिल हो गया है।





