समुद्र के गायब होने से हुआ था एशिया का निर्माण 

जनप्रवाद ब्यूरो नई दिल्ली। एक नए अध्ययन में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। शोधकर्ताओं के अनुसार समुद्र के गायब होने से एशिया का निर्माण हुआ है। इससे पता चलता है कि जहां एशिया महाद्वीप है वहां पहले समुद्र हुआ करता था। इस शोध में हिमालय को लेकर भी एक बड़ा राज खुला है। 
नए अध्ययन में खुलासा

नए वैज्ञानिक अध्ययन में बेहद चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। इस जानकारी में एशिया महाद्वीप से लेकर हिमालय तक शामिल हैं। शोध के अनुसार आज जिस एशिया महाद्वीप को हम पहाड़, पठार और ऊबड़-खाबड़ भौगौलिक आकृतियों के रूप में देखते हैं, वहां पहले महासागर हुआ करता था। वैज्ञानिकों के अनुसार आज से करीब 10 करोड़ साल पहले धरती पर अलग-अलग संरचनाएं मौजूद थी। यह शोध जर्नल कम्यूनिकेशन, अर्थ और इनवारमेंट में प्रकाशित किया गया है। नए अध्ययन के अनुसार सेंट्रल एशिया की जटिल भौगोलिक संरचना केवल स्थानीय टेक्टोनिक टक्करों का नतीजा नहीं है, बल्कि प्राचीन टैथिस महासागर से इसका गहरा संबंध था। हिमालय के बनने से लाखों साल पहले ही यह महासागर, एशिया की भौगोलिक आकृति को आकार देने लगा था। 
यूनिवर्सिटी आफ एडिलेड का खुलासा

बता दें कि यह रिसर्च आस्ट्रेलिया की यूनिवर्सिटी आॅफ एडिलेड के वैज्ञानिकों ने की है। इस रिसर्च के अनुसार टैथिस समुद्र के प्रमाण आज भी मौजूद हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, टैथिस महासागर कभी विशाल महाद्वीपीय प्लेट्स के बीच फैला हुआ था। मेसोजोइक-सीनोजोइक युग के दौरान जब यह महासागर धीरे-धीरे खत्म हुआ तो इसके टेक्टोनिक प्रभाव दूर-दूर तक महसूस किए गए। समुद्र के खत्म होते ही भूगर्भीय शक्तियों ने आज के कजाखस्तान, उज्बेकिस्तान और पश्चिमी चीन के क्षेत्रों में प्राचीन फॉल्ट लाइनों को फिर से सक्रिय कर दिया। इस प्रक्रिया ने नई पर्वत श्रृंखलाओं को ऊपर उठा दिया। अध्ययन के प्रमुख लेखक और यूनिवर्सिटी आफ एडिलेड के पोस्टडॉक्टोरल रिसर्चर डॉ. सैम बून के अनुसार मध्य एशिया में पहाड़ों का निर्माण टैथिस महासागर की गतिशीलता से जुड़ा हुआ है।  यह खोज इस बात की ओर इशारा करती है कि पृथ्वी की प्रणालियां कितनी गहराई से आपस में जुड़ी हुई थी। हजारों किलोमीटर दूर होने के बावजूद महासागरीय प्रक्रियाएं एशिया के महाद्वीपीय आंतरिक हिस्सों को प्रभावित कर रही थीं। शोध के सह-लेखक और यूनिवर्सिटी आॅफ एडिलेड के असोसिएट प्रोफेसर स्टाइन ग्लोरी का मानना है कि आधुनिक पर्वत श्रृंखलाओं के उभरने से पहले भी मध्य एशिया का भू-दृश्य समुद्र के किनारे स्थित पहाड़ी था। उनके अनुसार, आज का मध्य एशिया मुख्य रूप से भारत-यूरेशिया प्लेटों की टक्कर से बना है। क्रिटेशियस काल में यहां की पहाड़ियों में डायनासोर घूमते थे।
डॉक्टर सैम बून बयान

डॉक्टर सैम बून का मानना है कि अध्ययन में पाया गया कि पिछले 25 करोड़ सालों में मध्य एशिया की जलवायु लंबे समय तक शुष्क बनी रही। इसका मतलब यह है कि स्थानीय पर्यावरणीय कारकों से ज्यादा प्रभाव दूरस्थ टेक्टोनिक बदलावों ने डाला। जिससे घाटियों और पर्वतों का जाल तैयार हुआ। इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने थर्मोक्रोनोलॉजी तकनीक का इस्तेमाल किया। जिससे यह समझा जा सके कि पर्वत के उठने और क्षरण के दौरान चट्टानें कैसे ठंडी हुईं। दूसरी ओर शोधकर्ताओं की टीम में शमिल रहे प्रोफेसर स्टाइन ग्लोरी का कहना है कि यह शोध युगांतकारी है। इससे पता चला है कि जब चट्टानें सतह की ओर आती हैं तो वे किस तरह ठंडी होती हैं। हमने टैथिस महासागर के विकास, बारिश के प्राचीन पैटर्न और मैंटल कन्वेक्शन मॉडल्स के साथ इन आंकड़ों का विश्लेषण किया। यह रिसर्च केवल मध्य एशिया तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिक अब इसी पद्धति का इस्तेमाल आस्ट्रेलिया-अंटार्कटिका के अलगाव जैसे रहस्यमय घटनाक्रमों को समझने के लिए कर रहे हैं। डॉ. बून के अनुसार करीब 8 करोड़ साल पहले अंटार्कटिका से अलग होकर आस्ट्रेलिया का निर्माण हुआ था।