जन प्रवाद, ब्यूरो।
मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने whatsapp को सख्त चेतावनी दे दी। कोर्ट ने कहा कि अगर आपको भारत के संविधान की पॉलिसी नहीं माननी है तो देश छोड़कर जा सकते हैं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि टेक्निकल कंपनियां भारत में रहकर भारत के ही नागरिकों के निजता अधिकार का हनन करती हैं। अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि अगर कंपनियां संविधान का पालन नहीं कर सकतीं, तो उन्हें देश छोड़ चले जाना चाहिए।
इस मामले पर चल रही है सुनवाई :
अदालत META और whatsapp की उस अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उन्होंने राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) के फैसले को चुनौती दी है। इस फैसले में प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) द्वारा 2021 की whatsapp प्राइवेसी पॉलिसी पर लगाए गए 213.14 करोड़ रुपये के जुर्माने को बरकरार रखा गया था। सीसीआई ने भी एक अलग अपील दाखिल कर (NCLAT) के उस आदेश को चुनौती दी है, जिसमें विज्ञापन के लिए user data साझा करने की अनुमति दी गई थी।
9 फरवरी को आएगा अंतरिम आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को भी इस याचिका में एक पक्ष बनाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कंपनियों को चेतावनी दी है कि या तो वे डेटा शेयर न करने का लिखित आश्वासन दें, वरना अदालत को आदेश पारित करने पर मजबूर होना होगा। बेंच ने कहा कि इस मामले में 9 फरवरी को अंतरिम आदेश पारित किया जाएगा।
कोर्ट ने उठाए कई अहम सवाल :
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि whatsapp का मार्केट में दबदबा है, जबकि यूजर्स के पास सीमित विकल्प हैं। अदालत ने सवाल उठाया कि क्या आम लोग कंपनी की जटिल प्राइवेसी पॉलिसी को समझ सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि यूजर्स की सहमति तभी मान्य होगी, जब वह स्पष्ट और समझने योग्य होंगे।
सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यूजर्स का डेटा केवल संग्रहित ही नहीं किया जा रहा, बल्कि उसका व्यावसायीकरण भी किया जा रहा है। अदालत ने यह भी पूछा कि व्हाट्सएप किस तरह यूजर डेटा का इस्तेमाल टारगेटेड विज्ञापन के लिए करता है, यह सब जानते हैं। मुख्य न्यायाधीश ने अपने अनुभव का जिक्र करते हुए कहा कि स्वास्थ्य से जुड़े संदेश भेजने के बाद विज्ञापन दिखाई देने लगते हैं, जो डेटा उपयोग पर सवाल खड़े करता है।

‘डेटा शेयरिंग के नाम पर चोरी बर्दाश्त नहीं’ :
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने व्हाट्सएप की प्राइवेसी पॉलिसी की भाषा पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि निजता का अधिकार इस देश में बहुत महत्वपूर्ण है और कंपनियां इसका उल्लंघन नहीं कर सकतीं।
चीफ जस्टिस ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा, ‘‘आप डेटा शेयरिंग के बहाने इस देश की प्राइवेसी के साथ नहीं खेल सकते। आपकी प्राइवेसी की शर्तेंे इतनी चालाकी से तैयार की गई हैं कि एक आम आदमी उन्हें समझ ही नहीं पाता। यह निजी जानकारी चोरी करने का एक ‘सभ्य तरीका’ है, जिसे हम होने नहीं देंगे।’’

जानें, क्या है पूरा मामला :
यह मामला भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) के नवंबर 2024 के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें व्हाट्सएप की 2021 की प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर कहा गया था कि कंपनी भारत के मैसेजिंग बाजार में अपने दबदबे का दुरुपयोग कर रही है। सीसीआई का आरोप था कि ‘व्हाट्सएप ने लेना है तो लो, नहीं तो छोड़ दो ’मॉडल के तहत यूजर्स को मेटा और उसकी अन्य इकाइयों के साथ डेटा शेयरिंग के लिए मजबूर किया। इस मामले में नियामक संस्था ने पाया कि व्हाट्सएप की मैसेजिंग सेवा तक पहुंच को गैरकानूनी तरीके से डेटा शेयरिंग की सहमति से जोड़ा गया, जो प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 का उल्लंघन है। इसके चलते सीसीआई ने मेटा पर 213.14 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था और साफ आॅप्ट-इन व आॅप्ट-आउट विकल्पों व अधिक पारदर्शिता के जरिए यूजर्स की पसंद बहाल करने के निर्देश दिए थे।
मेटा और व्हाट्सएप ने इस आदेश को एनसीएलएटी में चुनौती दी थी। नवंबर 2025 में ठउछअळ ने विज्ञापन से जुड़े डेटा शेयरिंग पर लगाए गए पांच साल के प्रतिबंध को हटा दिया और मेटा के विज्ञापन इकोसिस्टम में अवैध लाभ उठाने से जुड़े निष्कर्षों को पलट दिया, लेकिन 213.14 करोड़ रुपये के जुमार्ने को बरकरार रखा था।
अदालत ने साफ कर दिया है कि वह मेटा और व्हाट्सएप को डेटा का एक शब्द भी साझा करने की अनुमति नहीं देगी। अब सबकी निगाहें 9 फरवरी पर टिकी हैं, जब कोर्ट इस मामले में अपना अंतरिम फैसला सुनाएगा।





