अंतरिक्ष में भारत ने रचा इतिहास, पहले निजी रॉकेट विक्रम-1 की सफल लाचिंग

जनप्रवाद ब्यूरो, नई दिल्ली। भारतीय वैज्ञानिकों ने एलन मस्क को सीधी चुनौती पेश कर कर दी है। स्काईरूट एयरोस्पेस का निजी तौर पर विकसित रॉकेट विक्रम-1 मिशन श्रीहरिकोटा से लांच किया गया। पीएम मोदी ने इसे भारत की अंतरिक्ष यात्रा का नया अध्याय बताया। साथ ही टीम को शुभकामनाएं दीं। यह भारत का पहला निजी आर्बिटल लांच व्हीकल है, जो सैटेलाइट को अंतरिक्ष कक्षा में पहुंचाने के लिए डिजाइन किया गया है। 
'मिशन आगमन' रखा नाम


यह पहली बार है जब भारत में किसली निजी कंपनी ने खुद के आर्बिटल रॉकेट से उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित किया है। हैदराबाद की निजी अंतरिक्ष कंपनी स्काईरूट एयरोस्पेस अपने पहले आर्बिटल क्लास रॉकेट विक्रम-1 का पहला परीक्षण मिशन 'मिशन आगमन' लॉन्च किया। निजी अंतरिक्ष क्षेत्र की इस ऐतिहासिक उड़ान के साथ पीएम मोदी का विशेष संदेश अपने साथ ले गया। पीएम मोदी ने स्काईरूट को भेजे गए एक पोस्टकार्ड पर सिर्फ वंदे मातरम लिखा है। यह पोस्टकार्ड दुनिया भर के लोगों की शुभकामनाओं और आकांक्षाओं वाले सैकड़ों अन्य कार्डों के साथ पृथ्वी के वायुमंडल से बाहर गया। इसमें कहा गया है कि अंतरिक्ष में हर नया उपग्रह पृथ्वी पर जीवन को बदल देता है। ये उपग्रह इंटरनेट कनेक्टिविटी, नेविगेशन, प्रेसिजन एग्रीकल्चर, मौसम पूवार्नुमान, आपदा प्रबंधन, राष्ट्रीय सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन से लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
हर चरण के प्रदर्शन का आकलन

इस उड़ान का उद्देश्य रॉकेट के उड़ान भरने से लेकर अंतरिक्ष की ओर बढ़ने के हर चरण के प्रदर्शन का आकलन करना है। इसके जरिये प्रणोदन प्रणाली (प्रोप्लशन सिस्टम)विभिन्न चरणों के अलग होने की प्रक्रिया, मार्गदर्शन, नेविगेशन, नियंत्रण प्रणाली और रॉकेट के समग्र प्रदर्शन से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े जुटाए जाएंगे। स्काईरूट एयरोस्पेस के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी पवन कुमार चंदाना का कहना है कि रॉकेट के वास्तविक प्रदर्शन को पूरी तरह जमीन पर किए गए परीक्षणों से नहीं समझा जा सकता। उड़ान के दौरान मिलने वाले आंकड़े रॉकेट की डिजाइन को परखने और भविष्य में और बेहतर प्रक्षेपण यान विकसित करने में मदद करेंगे। अगर इस पूरे मिशन के बारे में बात करें तो विक्रम-1 रॉकेट का नाम भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक, डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में रखा गया है। वक्रम-1 एक 24 मीटर लंबा आॅर्बिटल क्लास रॉकेट है, जिसे छोटे उपग्रहों के प्रक्षेपण के लिए तैयार किया गया है।  कंपनी के अनुसार कार्बन फाइबर सबसे मजबूत स्टील की तुलना में लगभग पांच गुना हल्का होता है, जिससे रॉकेट अधिक दक्ष बनता है। रॉकेट में तीन सॉलिड प्रोपल्शन स्टेज हैं, जबकि सबसे ऊपर एक आॅर्बिटल एडजस्टमेंट मॉड्यूल लगाया गया है। यह पूरी तरह हल्के कार्बन-कॉम्पोजिट स्ट्रक्चर से बना है, जिससे इसका वजन कम और क्षमता अधिक हो जाती है।  विक्रम-1 में कई ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है, जिनका भारत में पहली बार उपयोग किया गया है।  रॉकेट के सभी लिक्विड इंजन धातु से बने 3डी-प्रिंटेड इंजन हैं। इस तकनीक की मदद से पहले जिन इंजनों को बनाने में सैकड़ों पुर्जे लगते थे, उन्हें एक ही प्रिंटेड इंजन में तैयार किया जा सकता है। इससे निर्माण का समय भी काफी कम हो जाता है। इसके अलावा कंपनी ने अपना स्वयं का न्यूमेटिक स्टेज सेपरेशन सिस्टम भी विकसित किया है, जो मॉड्यूलर होने के साथ परीक्षण योग्य भी है। कंपनी का कहना है कि इन तकनीकों से रॉकेट को अधिक विश्वसनीय, हल्का और लागत प्रभावी बनाया गया है।
कॉसमॉस डायमंड्स द्वारा विकसित लैब में तैयार

कॉसमॉस डायमंड्स द्वारा विकसित लैब में तैयार किया गया डायमंड लोटस भी शामिल है। साथ ही अजय कुमार मट्टेवाड़ा की बनाई गई माइक्रोआर्ट भी विक्रम-1 मिशन के साथ अंतरिक्ष में भेजी जा रही है। इसमें 18 कैरेट सोने से बना एक छोटा रॉकेट है, जिसके अंदर भारत के तीन महान वैज्ञानिकों सर सीवी रमन, डॉ. विक्रम साराभाई और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की बेहद सूक्ष्म मूर्तियां बनाई गई हैं। इन मूर्तियों का आकार इतना छोटा है कि वे चावल के एक दाने से भी छोटी हैं। यह मिशन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि  यह मिशन भारत के निजी अंतरिक्ष उद्योग को नई शुरूआत देगा। इससे आने वाले समय में इसरो के साथ मिलकर निजी कंपनियां भी सैटेलाइट लांच करने का काम करेंगी।