इजरायल में किसी भी खेमे को साफ बहुमत नहीं, अधर में फंसे नेतन्याहू

जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। इजरायल में आम चुनावों के लिए वोटिंग हो चुकी है। 1988 के बाद पहली बार इतनी बंपर वोटिंग हुई है। इस चुनाव में सबसे बड़ी बात यह है कि किसी को बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है। अब सबकी नजरें डबल इनवेलप वोट पर टिकी हैं। जानकारों का कहना है कि अगर जीत आइजनकोट की होती है तब इजरायल और ईरान युद्ध को लेकर कोई बड़ा परिवर्तन हो सकता है।
हमास हमले के गाजा युद्ध


7 अक्टूबर, 2023 को हुए हमास हमले और उसके बाद गाजा, लेबनान और ईरान में चली जंग के बाद इजरायल में पहली बार आम चुनाव हुए। इस राष्ट्रीय चुनाव में किसी को साफ बहुमत नहीं मिला है। नेतन्याहू का गठबंधन बहुमत से पीछे है। वहीं विपक्षी गादी आइजनकोट का गुट भी बहुमत हासिल करने में नाकाम रहा है। अब सबकी नजर डबल इनवेलप वोट पर है। इन वोटों की गिनती से सीटों का गणित बदल सकता है। बता दें  कि डबल एनवेलप वोट वे होते हैं जो मतदान बूथ पर न जाकर लिफाफे के जरिए अपनी मतपत्र चुनाव अधिकारियों को सौंपते हैं। केंद्रीय चुनाव समिति के अनुृसार तकरीबन 6 लाख वोट गिने जाने हैं। इनमें सैनिकों, विदेश में तैनात राजनयिकों, कैदियों और अस्पतालों में भर्ती लोगों समेत दूसरे पात्र मतदाताओं के वोट शामिल हैं। 
इजरायल की संसद को नाम नेसेट 

बता दें कि इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है। इसमें कुल 120 सीटें हैं। इजराइल की संसद में कुल 120 सीटें हैं। सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सीटों की जरूरत होती है। इजराइल के 76 साल के इतिहास में आज तक किसी भी राजनीतिक पार्टी ने अकेले बहुमत हासिल नहीं किया है। इजराइल में वोटिंग के तरीकों की बात करें तो यहां का चुनाव भारत समेत अन्य लोकतांत्रिक देशों से अलग होता है। यहां के लोग किसी नेता को नहीं, बल्कि उसकी पार्टी को वोट देते हैं। चुनाव से पहले हर पार्टी अपने उम्मीदवारों की एक सूची बनाती है। पूरे देश में पार्टी को मिले वोटों के आधार पर तय होता है कि उसे संसद में कितनी सीटें मिलेंगी। वहीं संसद में सीट पाने के लिए एक शर्त है। किसी पार्टी को कुल वैध वोटों में से कम से कम 3.25 प्रतिशत वोट हासिल करने होते हैं। इससे कम वोट मिलने पर पार्टी को संसद में कोई सीट नहीं मिलती। पार्टी के कौन से उम्मीदवार सांसद बनेंगे, इसका फैसला उम्मीदवारों की लिस्ट से होता है। हर पार्टी चुनाव से पहले अपने उम्मीदवारों की एक लिस्ट जारी करती है। अगर किसी पार्टी को 20 सीटें मिलती हैं, तो लिस्ट में पहले 20 नंबर पर मौजूद उम्मीदवार सांसद बन जाएंगे।
किसी भी खेमे को साफ बहुमत नहीं 

कुल मिलाकर देखा जाए तो यहां किसी भी खेमे को साफ बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है। सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सीटों का समर्थन जरूरी है। आंशिक काउंटिंग में नेतन्याहू के गठबंधन को 53 सीटें मिलने का अनुमान है। वहीं, गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें मिलती दिख रही हैं। अरब दलों को 19 सीटें मिलने का अनुमान है। विपक्षी गठबंधन और अरब दलों की सीटें जोड़ने पर आंकड़ा 67 तक पहुंचता है लेकिन इनके बीच राजनीतिक मतभेद हैं। नेतन्याहू ने अरब पार्टियों के साथ गठबंधन को देश विरोधी करार दिया। वहीं आइजनकोट गुट भी अरब पार्टियों के साथ सरकार बनाने के पक्ष में नहीं है। नेतन्याहू और आइजनकोट ने एक दूसरे के साथ मिलकर भी सरकार बनाने की संभावना से इनकार कर दिया है। मीडिया रिपोर्टों का मानना है कि बेनतीजा रहे चुनावी परिणाम के बाद देश में कई हफ्तों तक गठबंधन बनाने के लिए बातचीत चल सकती है। यहां तक कि दोबारा चुनाव कराने की नौबत भी आ सकती है। इस राजनीतिक गतिरोध का फायदा नेतन्याहू को मिल सकता है। नई सरकार के गठन को लेकर राजनीतिक दलों के बीच बातचीत चलने तक वह कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रह सकते हैं। वहीं ईरान के साथ युद्ध को लेकर बात करें तो संसदीय चुनाव से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को खुलकर समर्थन किया था। ट्रंप ने इजरायली मतदाताओं से नेतन्याहू को वोट देने की अपील करते हुए कहा कि उन्हें वह काम पूरा करना है, जो दोनों नेताओं ने मिलकर शुरू किया था। ट्रंप के इस बयान के बाद ईरान के खिलाफ दोबारा सैन्य कार्रवाई की संभावनाओं को लेकर चर्चा तेज हो गई है।  नेतन्याहू ने भी संकेत दिए हैं कि अगर वह सत्ता में बने रहते हैं तो ईरान के खिलाफ आगे की कार्रवाई की जा सकती है।  इजरायल में नेतन्याहू के सामने गादी आइजनकोट हैं। वे इजरायल में सेना प्रमुख रह चुके हैं। ऐसे में खुद को ज्यादा जिम्मेदार और जानकार व्यक्ति के रूप में जनता के सामने रख रहे हैं। जानकारों का कहना है कि इजरायल में सत्ता परिवर्तन होने से अमेरिका-इजरायल सुरक्षा संबंधों में कोई बदलाव तो नहीं आएगा लेकिन ईरान के साथ युद्ध जारी रखने पर बड़ा निर्णय हो सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि आइजनकोट के समर्थकों का कहना है कि नेतन्याहू ईरान युद्ध को चुनावी फायदे के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।