ग्रेविटी होल के ऊपर है अंटार्कटिका, अचानक पिघल सकती है सारी बर्फ

अंटार्कटिका के नीचे दुनिया का सबसे बड़ा ग्रैविटी होल

जनप्रवाद ब्यूरो। रहस्यमयी माने जाने वाली जगहों में शामिल अंटार्कटिका के नीचे दुनिया का सबसे बड़ा ग्रैविटी होल मिला है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह ग्रैविटी होल बेहद खतरनाक हो सकता है। इससे सारी की सारी बर्फ पिघल सकती है। अगर ऐसा हुआ तो यह घटनाक्रम धरती पर तबाही लेकर आएगा।

चौंकाने वाले राज से उठाया पर्दा 

वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिका महाद्वीप के नीचे दबे चौंकाने वाले राज से पर्दा उठाया है। रिसर्च के अनुसार अंटार्कटिका धरती के सबसे शक्तिशाली ग्रैविटी होल के ऊपर स्थित है। इसका मतलब यह है कि यहां गुरुत्वाकर्षण बल बाकी दुनिया के मुकाबले काफी कमजोर है। साइंटिफिक रिपोर्ट्स में छपी इस रिसर्च के अनुसार धरती के अंदर मौजूद चट्टानों का घनत्व एक समान नहीं पाया गया है। अंटार्कटिका के ठीक नीचे गहराई में चट्टानों की डेंसिटी बहुत कम पाई गई है। इसी वजह से वहां गुरुत्वाकर्षण का खिंचाव भी काफी कमजोर हो गया है। अध्ययन टीम को लीड कर रहे फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी के जियोफिजिक्स प्रोफेसर एलेसेंड्रो फोर्टे ने इस रहस्य की कई जानकारियां साझा की हैं। उनके अनुसार यह ग्रैविटी होल करोड़ों सालों से धरती के अंदर हो रही हलचल का नतीजा है। फोर्टे के अनुसार जहां ग्रैविटी लो हो जाती है वहां कई सारे बदलाव दिखने लग जाते हैं। यह प्रकृति और जीवों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। दिलचस्प बात यह है कि इस ग्रैविटी होल का सीधा असर समुद्र के जलस्तर पर पड़ता है। जहां गुरुत्वाकर्षण कम होता है, वहां समुद्र की सतह बाकी जगहों की तुलना में थोड़ी नीचे धंस जाती है।
कई तरह की विधियों का सहारा

फोर्टे के अनुसार इस खोज के लिए कई तरह की विधियों का सहारा लिया गया। इनमें सबसे प्रमुख भूमिका भूकंपीय तरंगों की रही। जैसे डॉक्टर शरीर का सीटी स्कैन करते हैं, वैसे ही उन्होंने भूकंप की लहरों से धरती का आंतरिक नक्शा तैयार किया गया। इस डेटा की मदद से 7 करोड़ साल पीछे जाकर देखा गया कि यह होल कैसे बना। जब अध्ययन किया जा रहा था तो पाया गया कि 3 करोड़ से 5 करोड़ साल के बीच यह ग्रैविटी होल अचानक बहुत मजबूत होने लगा था। यही वह दौर था जब अंटार्कटिका पर बर्फ की चादरें जमना शुरू हुई थीं।
ग्रैविटी में भी आ रहा बदलाव 

वैज्ञानिकों के अनुसार ग्रैविटी होल की वजह से अंटार्कटिका के आसपास समुद्र का लेवल उम्मीद से कम रहता है। पानी हमेशा कम गुरुत्वाकर्षण वाले इलाके से खिंचकर ज्यादा गुरुत्वाकर्षण वाली जगहों की ओर भागता है। अगर भविष्य में धरती के अंदर चट्टानों की स्थिति बदलती है, तो ग्रैविटी में भी बदलाव आएगा। इससे समुद्र का पानी नई दिशाओं में शिफ्ट हो सकता है। प्रोफेसर फोर्टे का लक्ष्य अब यह समझना है कि कैसे धरती के भीतर की गर्मी और चट्टानों का बहाव हमारे समुद्रों और बर्फ की स्थिरता को तय करता है। रिसर्च में पाया गया है कि अंटार्कटिका की जलवायु और इस ग्रैविटी होल का गहरा कनेक्शन है। जब यह ग्रैविटी होल ताकतवर हुआ, तभी अंटार्कटिका पर बड़े पैमाने पर ग्लेशियर बनने लगे। अब वैज्ञानिक इस बात की जांच कर रहे हैं कि क्या गुरुत्वाकर्षण में बदलाव की वजह से ही बर्फ जमी थी। अगर धरती के अंदर होने वाली हलचल ग्रैविटी को बदल सकती है, तो इसका असर भविष्य में बर्फ के पिघलने पर भी पड़ सकता है। यह स्टडी हमें बताती है कि धरती का इंटीरियर हमारे क्लाइमेट को कंट्रोल कर रहा है।