जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। अंतरिक्ष में वैज्ञानिकों को ऐसा नजारा दिखा जिसे देखकर सभी सन्न रह गए। नासा के जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप की तस्वीरों में पाया गया कि ब्रह्मांड में एक नहीं दो शनि ग्रह है। जब वैज्ञानिकों ने इस विषय पर पूरा अध्ययन किया तो सच्चाई सामने आई।
रहस्यों से भरा है हमारा ब्रह्मांड
हमारा ब्रह्मांड रहस्यों से भरा हुआ है। यह लगभग 13.8 अरब वर्ष पुराना है। इसकी शुरूआत एक अत्यधिक गर्म और घने बिंदु से बिग बैंग यानी महाविस्फोट के साथ हुई थी। यह लगभग 93 अरब प्रकाश-वर्ष के व्यास में फैला हुआ है। इसमेंइसमें आकाशगंगाएं तारे, ग्रह, धूलकण, डार्क मैटर और डार्क एनर्जी शामिल हैं। अब इस ब्रह्मांड को लेकर एक और खुलासा हुआ है। नासा के जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप ने एस्टेरॉयड चारिक्लो के रिंग्स पर जब रोशनी डाली तो चौंकाने वाले परिणाम सामने आए। तस्वीरों को देखकर वैज्ञानिकों की टीम ने पाया कि एस्टेरॉयड के पास शनि ग्रह की तरह छल्ले हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इसके दोनों छल्लों में एक दशक के भीतर बड़े बदलाव आ रहे हैं। अंदरूनी रिंग जहां घनी हो रही है, वहीं बाहरी रिंग पतली पड़ती जा रही है। इस रहस्यमय बदलाव ने खगोलविदों को छोटे खगोलीय पिंडों के रिंग्स की थ्योरी पर दोबारा सोचने को मजबूर कर दिया है।
एस्टेरॉयड्स के चारों तरफ रिंग्स
वैज्ञानिकों को पहले लगता था कि छोटे एस्टेरॉयड्स के चारों तरफ मौजूद रिंग्स पूरी तरह स्थिर रहते हैं। अब नए डेटा ने इस पूरी पुरानी समझ को हिलाकर रख दिया है। स्पेन के वैज्ञानिकों की लीडरशिप में हुई इस स्टडी ने सौरमंडल के सबसे सुरक्षित माने जाने वाले रिंग सिस्टम्स पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। बता दें कि चारिक्लो हमारे सौरमंडल के सेंटॉर परिवार का एक बहुत छोटा सा एस्टेरॉयड है। यह अंतरिक्ष में सैटर्न और यूरेनस ग्रहों के बीच सूरज के चक्कर लगाता है। सूरज से इसकी दूरी धरती के मुकाबले लगभग सत्रह गुना ज्यादा है। इसका कुल साइज केवल 250 किलोमीटर यानी करीब 155 मील चौड़ा है। इतने छोटे आकार के बावजूद इसके पास दो बेहद घने और साफ रिंग्स मौजूद हैं। आमतौर पर हम रिंग्स के नाम पर केवल शनि ग्रह को ही सबसे मशहूर मानते हैं। यूरेनस, नेपच्यून और जुपिटर के पास भी रिंग्स हैं, लेकिन वे काफी धुंधले हैं। वैज्ञानिकों को साल 2013 में पहली बार पता चला था कि चारिक्लो जैसे छोटे पिंड भी अपने रिंग्स बना सकते हैं। अब जेम्स वेब टेलीस्कोप ने साबित किया है कि इसका रिंग सिस्टम पहले के अनुमान से कहीं ज्यादा जटिल और एक्टिव है। इसके राज सुलझाने के लिए वैज्ञानिकों ने स्टेलर आॅकल्टेशन नाम की बेहद सटीक तकनीक का इस्तेमाल किया। इस तकनीक में जब कोई आॅब्जेक्ट किसी दूर मौजूद तारे के सामने से गुजरता है, तो तारे की रोशनी में आने वाली गिरावट को नापा जाता है। स्पेन के इंस्टीट्यूट आॅफ एस्ट्रोफिजिक्स आॅफ अंडालूसिया के रिसर्चर्स ने अक्टूबर 2022 से यह मॉनिटरिंग शुरू की थी। टीम के लीडर पाब्लो सैंटोस-सांज के अनुसार पिछले दस सालों के पुराने डेटा से तुलना करने पर हैरान करने वाला सच सामने आया। अंदरूनी रिंग की ओपेसिटी काफी बढ़ गई है, जिससे वह ज्यादा घना दिखने लगा है। इसके उलट बाहरी रिंग की ओपेसिटी कम हो गई है, यानी वह लगातार हल्का पड़ता जा रहा है।
सौरमंडल रिंग की नई थ्योराी
बता दें कि इस स्टडी ने पूरे सौरमंडल के रिंग सिस्टम्स को समझने के लिए एक नई खिड़की खोल दी है। दोनों छल्लों में इतने कम समय में यह बदलाव क्यों आ रहा है, इसका ठोस कारण अभी तक एक गहरा रहस्य बना हुआ है। वैज्ञानिकों को मानना है कि वहां कोई अनदेखा छोटा चंद्रमा मौजूद है जो इन दोनों छल्लों के मटीरियल को इधर-उधर खींच रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह रिसर्च सिर्फ एस्टेरॉयड्स को समझने के लिए ही नहीं, बल्कि खुद जेम्स वेब टेलीस्कोप की इंजीनियरिंग के लिए ऐतिहासिकल उपलब्धि है। ऐसा इसलिए है क्योंकि धरती से 15 लाख किलोमीटर दूर एल-2 लाग्रेंज पॉइंट पर घूम रहे आब्जेक्ट को ट्रैक करना बहुत मुश्किल काम था।





