जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। कनाडा के प्राचीन ज्वालामुखीय विस्फोट ने वैज्ञानिकों को बेचैन कर दिया है। उनके अनुसार यह धरती पर हिमयुग की शुरुआत है। नए अध्ययन में दावा किया गया है कि करोड़ों वर्ष पहले पृथ्वी पर आए सबसे लंबे स्टर्टियन हिमयुग के पीछे विशाल ज्वालामुखीय गतिविधियां जिम्मेदार थीं। वातावरण से कार्बन डाइआक्साइड कम होने के कारण पृथ्वी लंबे समय तक बर्फ से ढकी रही।
कोई परिकल्पना नहीं है हिमयुग
हिमयुग कोई परिकल्पना नहीं है। यह पूरी दुनिया फैली वास्तविक सच्चाई थी। भारत में भी 37 हजार साल पहले हिमयुग आया था। शोधकर्ताओं का मानना है कि वायुमंडल से लेकर समुद्र तक में कार्बन जमा होना इस प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाता है। जब वायुमंडल में सीओ2 बढ़ता है और ग्रह गर्म होता है, तो फास्फोरस जैसे तत्व बाहर निकलते हैं। ये तत्व प्लैंकटन की वृद्धि को प्रोत्साहित करते हैं। बता दें कि प्लैंकटन सूर्य की रोशनी की मदद से कार्बन डाइआॅक्साइड को अवशोषित करते हैं। जब प्लैंकटन मरते हैं, तो उनका शरीर कार्बन के साथ वायुमंडल में फैल जाता है। जिससे कार्बन स्थायी रूप से जमा हो जाता है। अब पृथ्वी के इतिहास के सबसे लंबे और रहस्यमय हिमयुगों में से एक स्टर्टियन ग्लेशिएशन को लेकर वैज्ञानिकों ने नया खुलासा किया है। लगभग 71.7 करोड़ से 66 करोड़ वर्ष पहले क्रायोजेनियन काल के दौरान फैला यह हिमयुग करीब 5.6 करोड़ वर्ष तक चला था।
ज्वालामुखीय विस्फोट पर अध्ययन
कनाडा के प्राचीन ज्वालामुखीय विस्फोट पर हुए नए अध्ययन में यह खुलासा हुआ है। इसमें दावा किया गया है कि विशाल ज्वालामुखीय घटनाओं ने वातावरण से भारी मात्रा में कार्बन डाइआक्साइड हटाकर पृथ्वी को बार-बार जमने और पिघलने के चक्र में धकेला। शोधकर्ताओं के अनुसार यही प्रक्रिया इस असाधारण रूप से लंबे हिमयुग की वजह बन सकती है। अर्थस्नैप में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार यह अध्ययन अमेरिका की हार्वर्ड जॉन ए. पॉलसन स्कूल आॅफ इंजीनियरिंग एंड एप्लाइड साइंसेज की शोधार्थी शार्लोट मिन्स्की के नेतृत्व में किया गया है।
पीएनएएस में प्रकाशित हुआ लेख
यह पूरा शोध प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका प्रोसीडिंग्स आॅफ द नेशनल एकेडमी आॅफ साइंसेज यानी पीएनएएस में प्रकाशित हुआ है। क्रायोजेनियन काल के दौरान पृथ्वी पर ऐसे दौर आए जब माना जाता है कि ग्रह का अधिकांश हिस्सा बर्फ से ढक गया था। यही कारण है कि वैज्ञानिकों ने कनाडा के ज्वालामुखी पर हुए नए अध्ययन को स्नोबॉल अर्थ नाम दिया है। इसी तरह वैज्ञानिकों ने
अटलांटिक महासागर की मुख्य समुद्री धारा पर भी बड़ा दावा किया है। उनके अनुसार यह धारा यूरोप और कई महाद्वीपों को गर्म रखती है। अब यह खत्म यानी ठंडी हो रही है। इसे दुनिया के लिए बड़ा खतरा माना जा रहा है। यह धारा अगर रुक गई तो पूरे यूरोप में फिर से हिमयुग आ सकता है। यानी चारों तरफ बर्फ ही बर्फ नजर आएगी। बता दें कि अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सकुर्लेशन नाम की यह धारा गर्म पानी को उष्णकटिबंधीय क्षेत्र से आर्कटिक की ओर ले जाती है। इससे यूरोप में सर्दियां हल्की होती हैं। वहीं जलवायु परिवर्तन से आर्कटिक की बर्फ पिघल रही है। ऐसे में ग्रीनलैंड की बफीर्ली चादर से ठंडा पानी समुद्र में बह रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह ठंडा पानी धारा को बाधित कर सकता है। अगर गर्म पानी की धारा रुक गई तो उत्तरी यूरोप में सर्दियों का तापमान बहुत गिर जाएगा। बर्फ और बफीर्ले तूफान बढ़ जाएंगे।





