वैज्ञानिकों ने की हैरान करने वाली खोज, धरती पर मिला दूसरे ग्रह का पानी 

जनप्रवाद ब्यूरो, टीम। वैज्ञानिकों ने धरती पर दूसरे ग्रह का पानी खोज निकाला है। यह रहस्यमयी जल करीब 40 करोड़ साल पुराने एक पौधे के भीतर छिपा हुआ मिला। इसे अमर जल और टाइम मशीन माना जा रहा है। यह धरती की उत्पत्ति से लेकर विनाश तक का पूरा रहस्य बता सकता है।
धरती-ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति पर खोज जारी

धरती और ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और उसके विनाश दोनों विषयों पर अक्सर वैज्ञानिक शोध करते रहते हैं। अब तक इस विषय पर अनगिनत शोध सामने आ चुके हैं। इसी तरह धरती पर जल कहां से आया इसकी उत्पत्ति कैसे हुई यह भी शोध का विषय रहा है। बता दें कि पानी जीवन जीने का एक प्रमुख आधार माना जाता है। ये जीवन जीने के लिए कितना जरूरी है ये हर कोई जानता है। इंसान खाने के बिना तो कई दिनों तक रह सकता है लेकिन पानी के बिना उसका जीवन नहीं चल सकता। वैज्ञानिक ये कई बार कह चुके हैं कि पृथ्वी के अलावा दूसरे ग्रहों पर भी पानी की मौजूदगी है। इस बार उन्होंने एक साथ दोनों विषयों पर रहस्मयी खोज की है। 
करोड़ों साल पहले का खोजा पानी 

वैज्ञानिकों के अनुसार डायनासोरों के आने से भी करोड़ों साल पहले का पानी आज भी धरती पर मौजूद है। वैज्ञानिकों की इस खोज को एलियन लाइफ जैसा माना जा रहा है। इसमें एक 40 करोड़ साल पुराने पौधे के अवशेषों के अंदर पानी की सूक्ष्म बूंदें मिली हैं। इसका रासायनिक ढांचा आज के पानी से बिल्कुल अलग है। शोधकर्ताओं के अनुसार यह किसी दूसरे ग्रह जैसा रहस्यमयी है। वैज्ञानिक इसे धरती पर मिला दूसरे ग्रह जैसा पानी बता रहे हैं। इसकी बनावट और गुण इतने अलग हैं कि इसे देखकर वैज्ञानिक भी चौंक गए हैं। 
पौधों के अंदर मौजूद पानी का अध्ययन 

जब वैज्ञानिकों ने इस पौधे के अंदर मौजूद पानी का अध्ययन किया, तो पाया कि इसकी संरचना सामान्य पानी से अलग है। इसके अंदर मौजूद तत्वों का पैटर्न कुछ ऐसा है, जो आम तौर पर धरती के पानी में नहीं देखा जाता। यही कारण है कि इसे अलग तरह का या अजीब पानी कहा जा रहा है। बता दें कि 
स्कॉटलैंड के राइनी चर्ट इलाके में खुदाई चल रही थी। इस दौरान शोधकर्ताओं को एस्टेरोक्सिलॉन नाम का एक विलुप्त पौधा मिला। यह पौधा करोड़ों साल पहले ज्वालामुखी की गर्म राख और सिलिका के नीचे दब गया था। सिलिका ने इसके आसपास कांच जैसी परत बना दी थी। जिसने पौधे के अंदर मौजूद नमी को बाहरी हवा से पूरी तरह काट दिया था। इसलिए यह करोड़ों सालों से सुरक्षित था। जब वैज्ञानिकों ने लेजर स्कैनिंग और हाई टेक माइक्रोस्कोप से इसकी जांच की, तो पौधे की कोशिकाओं के अंदर पानी की नन्हीं बूंदें चमकती दिखीं।
पुरातत्वविदों और वैज्ञानिकों के लिए खोज 

पुरातत्वविदों और वैज्ञानिकों के लिए यह खोज किसी खजाने से कम नहीं है। यह पानी उस समय के इकोसिस्टम का एक छोटा सा नमूना है, जो लाखों-करोड़ों सालों तक पत्थर के अंदर सुरक्षित रहा। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी ने 40 करोड़ साल पहले की दुनिया को एक बोतल में बंद करके आज के वैज्ञानिकों के लिए छोड़ दिया हो। इस पानी में हाइड्रोजन और आॅक्सीजन के आइसोटोप्स का अनुपात आज के समुद्री या पीने के पानी से मेल नहीं खाता। यह वैसा ही है जैसा मंगल ग्रह या धूमकेतुओं पर मिलने वाले बर्फ के सैंपल्स में देखा गया है। यह पानी उस समय का है, जब पृथ्वी के वायुमंडल में आॅक्सीजन बहुत कम और कार्बन डाइआॅक्साइड बहुत ज्यादा थी। यह एक टाइम कैप्सूल की तरह है, जो बताता है कि तब धरती कैसी दिखती थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस पानी में कुछ ऐसे सूक्ष्म जीव या प्रोटीन हो सकते हैं, जो आज की दुनिया से पूरी तरह विलुप्त हो चुके हैं। यह खोज बता सकती है कि धरती और पानी की उत्पत्ति कैसे हुई। साथ ही यह पता चलेगा कि सालों में पृथ्वी का तापमान और पर्यावरण कैसे बदला। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर धरती पर ऐसा पानी मिल सकता है, तो सौर मंडल के अन्य ग्रहों पर भी इसी तरह की सील्ड परतों के नीचे जीवन की संभावना बढ़ सकती है। यह खोज हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हमारी धरती के नीचे अभी न जाने कितने ऐसे रहस्य दफन हैं, जो विज्ञान की पूरी परिभाषा बदल सकते हैं।