जनप्रवाद ब्यूरो, टीम। प्रशांत महासागर में हालीत इतने खराब होने वाले हैं जिसकी कोई परिकल्पना भी नहीं कर सकता। वैज्ञानिकों के अनुसार समंदर की गहराईयों में अमेरिका के परमाणु परीक्षण स्थल के पास न्यूक्लियर डोम फटने वाला है। इससे 120,000 टन रेडियोएक्टिव कचरा फैलने का खतरा है। यह जहर 24 हजार साल तक खत्म नहीं होगा। यह कचरा पूरी दुनिया में तबाही लाएगा।
रूनिट डोम बन रहा खतरनाक
प्रशांत महासागर के गहरे नीले पानी के बीच एक ऐसी जगह है, जिसे दुनिया मौत का गुंबद या रूनिट डोम के नाम से जानती है। वैज्ञानिकों ने इस जगह को लेकर बेहद खतरनाक भविष्यवाणी की है। उनके अनुसार मार्शल आइलैंड्स में मौजूद यह डोम अमेरिका के दर्जनों परमाणु परीक्षणों से निकले घातक रेडियोधर्मी कचरे का कब्रिस्तान बन चुका है। हालिया रिपोर्ट्स और वैज्ञानिकों की जांच में यह बात सामने आई है कि यह विशालकाय कंक्रीट का ढांचा अब कमजोर पड़ रहा है। समुद्र का बढ़ता जलस्तर और जलवायु परिवर्तन इस न्यूक्लियर टॉम्ब की दीवारों में दरारें डाल रहे हैं। सबसे मुश्किल वाली बात यह है कि इस दीवार की मरम्मत करना आसान नहीं है। इसके आसपास कोई भी व्यक्ति का वस्तु किसी हालत में नहीं बचेगा। अच्छे से अच्छा सुरक्षा उपकरण लगाकर भी इस दीवार के आसपास जाने वाले की जिंदगी की गारंटी नहीं दे पाएगा।
कचरे को लेकर चेतावनी
वैज्ञानिकों ने इस कचरे को लेकर चेतावनी दी है कि अगर यह कचरा पूरी तरह समुद्र में मिल गया, तो इसका परिणाम इतना भयानक होगा कि इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है। बता दें कि साल 1958 में अमेरिकी सेना ने मार्शल आइलैंड्स के रूनिट द्वीप पर कैक्टस नाम का एक परमाणु परीक्षण किया था। यह धमाका 18 किलोटन का था, जिसने जमीन पर एक बहुत बड़ा गड्ढा बना दिया था। 1970 के दशक में अमेरिका ने एनेवेटक एटोल के आसपास बिखरे हुए रेडियोधर्मी मलबे और दूषित मिट्टी को इकट्ठा करना शुरू किया। इस सफाई अभियान के दौरान करीब 1,20,000 टन जहरीला कचरा एकत्रित किया गया। इसे ले जाकर समुद्र के भीतर एक मजबूत ढांचा बनाकर इसमें भर दिया गया। इसके ऊपर 18 इंच मोटी कंक्रीट की एक चादर बिछा दी गई, जिसे आज हम रूनिट डोम कहते हैं। इसे केवल एक अस्थायी समाधान के तौर पर बनाया गया था। दशकों बाद भी यह वहीं मौजूद है। रिपोर्ट के अनुसार इस डोम के नीचे जो कचरा दबा है, उसमें प्लूटोनियम-239 की भारी मात्रा मौजूद है। यह एक ऐसा खतरनाक तत्व है जो 24,000 सालों तक इंसानों और पर्यावरण के लिए जानलेवा बना रह सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि डोम के नीचे की जमीन छिद्रपूर्ण कोरल से बनी है, जिसके कारण समुद्री पानी नीचे से अंदर घुस रहा है।
कोलंबिया यूनिवर्सिटी की रिसर्च
कोलंबिया यूनिवर्सिटी की रिसर्च के अनुसार, डोम के बाहर की मिट्टी में पहले से ही रेडिएशन का स्तर बढ़ा हुआ पाया गया है। यह इस बात का संकेत है कि या तो डोम लीक हो रहा है या फिर सफाई के वक्त भारी लापरवाही बरती गई थी। जलवायु वैज्ञानिकों का अनुमान है कि साल 2100 तक यहां समुद्र का स्तर 1 मीटर तक बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में रूनिट डोम पूरी तरह लहरों की चपेट में आ जाएगा। समुद्री तूफान और ऊंची लहरें इस कमजोर हो चुके ढांचे को कभी भी तोड़ सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कंक्रीट का यह कवच टूटा, तो प्रशांत महासागर में रेडिएशन का ऐसा सैलाब आएगा जो समुद्री ईकोसिस्टम को तबाह कर देगा। स्थानीय लोग जो इस द्वीप से महज 20 मील दूर रहते हैं। यह उनके लिए जीवन और मरण का सवाल बन चुका है। संयुक्त राष्ट्र और कई अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं ने अमेरिका से इस कचरे की जिम्मेदारी लेने की अपील की है। मार्शल आइलैंड्स के निवासियों का कहना है कि विदेशी ताकतों के परमाणु परीक्षणों ने उन्हें पीढ़ियों से विस्थापित किया है। अब यह उनके अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन गया है।





