समंदर की गहराईयों में हजारों सालों से दफन अनमोल खजाने का खुलेगा रहस्य!

जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। समंदर की गहराईयों में हजारों सालों से दफन एक अनमोल खजाने का रहस्य अब दुनिया सामने आएगा। इस काम के लिए भारत और डेनमार्क ने हाथ मिलाया है। दोनों देश मिलकर इस ऐतिहासिक खजाने की खोज करेंगे।  यह बात हम सभी जानते हैं कि सदियों पहले दुनियाभर के देशों के व्यापार समुद्र की रास्ते हुआ करता था। आवाजाही के दौरान कई जहाज समु्रदी तूफानों या उसकी भयानक लहरों कई बार डूब जाया करते थे। 17वीं सदी में ऐसा ही एक जहाज ‘ओरेसुंड’ भी बड़े हादसे का शिकार हो गया था। यह जहाज सुमुद्र की गहराईयों में डूब गया था। अब भारत और डेनमार्कने 17वीं सदी में डूबे डेनिश जहाज ‘ओरेसुंड’ की तलाश के लिए हाथ मिलाया है। वैज्ञानिक सर्वे के जरिए समुद्र के नीचे इस जहाज के अवशेष खोजे जाएंगे।
समुद्र की रास्ते हुआ करता था व्यापार 

इतिहासकारों के अनुसार यह वही जहाज था जिसने सबसे पहले डेनमार्क से भारत तक समुद्री यात्रा की थी। भारतीय जलक्षेत्र में पहुंचने के कुछ समय बाद ही यह दुर्घटना का शिकार हो गया था। इस परियोजना के तहत भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई और डेनमार्क के नेशनल म्यूजियम की एक्सपर्ट्स टीम संयुक्त रूप से समुद्र के अंदर वैज्ञानिक सर्वे करेगी। जांच का मुख्य क्षेत्र वर्तमान पुडुचेरी के कराईकल तट के आसपास होगा। जहां जहाज के डूबने की संभावना जताई जाती है। दोनों देशों के शोधकर्ता जांच को लेकर बेहद आशान्वित हैं। एएसआई के अनुसार अगर डूबा हुआ जहाज मिल जाता है तो ये खोज न केवल एक पुरानी दुर्घटना का रहस्य सुलझाएगी, बल्कि एक बेशकीमती खजाने को रहस्य को उजागर करेगी। इसके अलावा दोनों देशों के बीच 17वीं सदी के समुद्री व्यापार, जहाज निर्माण तकनीक और यूरोप-भारत के शुरूआती समुद्री संबंधों के बारे में भी महत्वपूर्ण जानकारी दे सकती है।
आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल 

इस खोज में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। शोधकर्ता समुद्र तल को बिना नुकसान पहुंचाए रिमोट सेंसिंग उपकरणों, विशेष सोनार तकनीक और अन्य अत्याधुनिक वैज्ञानिक साधनों की मदद से संभावित अवशेषों का पता लगाएंगे। परियोजना का मकसद केवल जहाज को ढूंढ़ना नहीं, बल्कि उससे जुड़े ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहलुओं को भी समझना है। इतिहासकारों के अनुसार ओरेसुंड जहाज उस दौर का प्रतीक है जब यूरोपीय देश एशिया के साथ व्यापारिक संबंध मजबूत करने के लिए समुद्री मार्गों का विस्तार कर रहे थे। ये वही समय था जब वैश्विक व्यापार तेजी से बढ़ रहा था और हिंद महासागर अंतरराष्ट्रीय व्यापार का प्रमुख केंद्र बनता जा रहा था। ऐसे में भारतीय पुरातत्व सर्वे के लिए ये परियोजना विशेष महत्व रखती है। यह परियोजना इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई के अंडरवॉटर आर्कियोलॉजी विंग की किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था के साथ पहली संयुक्त परियोजना है। इससे भारतीय विशेषज्ञों को वैश्विक स्तर की तकनीकों और शोध पद्धतियों से सीखने का अवसर मिलेगा।
जिब्राल्टर की खाड़ी में जहाजों की खोज

बता दें कि इससे पहले जिब्राल्टर की खाड़ी में जहाजों के संग्रह मिले थे। इन पानी में डूबे हुए जहाजों का मिलना किसी खजाने से कम नहीं है। सदियों पुराने ये मलबे बताते हैं कि यह इलाका व्यापार और युद्ध का कितना अहम केंद्र था। इससे साफ होता है कि यह समुद्री रास्ता हजारों सालों से लगातार इस्तेमाल होता रहा है। शोधकर्ताओं के अनुसार समुद्र मिला हर जहाज अपने समय की तकनीक, व्यापार और संस्कृति की अलग कहानी बयां करता है।  बता दें कि जिब्राल्टर जलडमरूमध्य एक संकरा रास्ता है, जहां से हर जहाज को गुजरना पड़ता था। इसी वजह से यहां कई जहाज दुर्घटनाओं का शिकार होकर डूब गए थे।