जनप्रवाद ब्यूरो, टीम। मंगल ग्रह पर जीवन संभव है या नहीं यह यक्ष प्रश्न आज भी बना हुआ है। इस विषय पर निरंतर खोज जारी है। अब भारतीय वैज्ञानिकों की स्टडी से दुनिया को उम्मीद की किरण जागी है। वहीं एक नया सवाल उठने लगा है कि क्या चांद और मंगल पर बच्चे भी पैदा किए जा सकते हैं।
आर्टेमिस की सफलता के बाद उत्साह
नासा के आर्टेमिस की सफलता के बाद दुनियाभर के वैज्ञानिक उत्साहित हैं। वे मंगल और चन्द्रमा पर इंसानी बस्ती देखना चाहते हैं। बता दें कि 1972 के मिशन अपोलो-17 के बाद नासा ने चंद्रमा पर पहला मानवयुक्त मिशन लांच किया था। इस मिशन का नाम आर्टेमिस रखा गया। नासा की तरह भारत ने भी अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान स्थापित कर ली है। 1975 में आर्यभट्ट उपग्रह के प्रक्षेपण के साथ ही देश ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में अपने कदम मजबूत किए थे। इसके बाद कई सफल अभियान चलाए। इसमें चन्द्रयान-3 ने तो इतिहास रच दिया था।
अनसुलझे रहस्यों को सुलझाने की दिशा में
अब भारतीय वैज्ञानिकों के शोध ने अंतरिक्ष से जुड़े कुछ अनसुलझे रहस्यों को सुलझाने की दिशा में दुनिया को उम्मीद की किरण जगा दी है। दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैम्पस के सूक्ष्मजीव विज्ञान विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. राम करण और उनके शोध के छात्रों शुभम पांडे, अंजलि गुप्ता और अश्विनी चौहान ने यह महत्वपूर्ण खोज की है। डॉ. राम करण और उनकी टीम का यह शोध प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय पत्रिका फ्रंटियर्स इन माइक्रोबायोलॉजी में अप्रैल यानी इसी माह प्रकाशित हुआ है। डॉ. राम करण और उनकी टीम ने अंटार्कटिका महाद्वीप की डीप लेक में मिलने वाले सूक्ष्मजीव हैलोरूबरुम लेकसप्रोफुंडी पर अपना शोध किया। लेख के अनुसार डीप लेक में दो तरह की दशाएं चरम सीमा पर मिलती हैं। एक तो यह अत्यंत ठंडा स्थल है और दूसरा यह अत्यधिक खारा है। हैलोरूबरुम जैसे सूक्ष्मजीव के लिए ऐसी दशाओं में जीवित रहना किसी अजूबे से कम नहीं है क्योंकि ऐसी दशाएं पृथ्वी पर कहीं और नहीं मिलतीं। बता दें कि मंगल जैसे ग्रहों पर वैसी ही मौसमी दशाएं उपस्थित हैं जैसी की अंटार्कटिक की डीप लेक में हैं। इससे हैलोरूबरुम जीवित रहता है। ऐसे में इस सूक्ष्मजीव पर किया गया यह शोध इस बात का पता लगाने में सहायता करेगा कि मंगल या उस जैसे अन्य ग्रहों पर कैसे जिंदा रहा जा सकता है। इसके बाद वैज्ञानिक यह भी पता लगा सकेंगे कि मंगल पर जीवन कैसे संभव हो सकता है।
चांद पर इंसानी बस्ती
अब जबकि पूरी दुनिया के वैज्ञानिक मंगल और चांद पर इंसानी बस्ती बसाना चाहते हैं तो एक सवाल बड़ी तेजी से उठ रहा है। सवाल यह कि क्या धरती के बाहर भी बच्चे पैदा किए जा सकते हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चलता है कि अंतरिक्ष में मौजूद माइक्रोग्रैविटी यानी शून्य गुरुत्वाकर्षण इंसानी प्रजनन प्रक्रिया को प्रभावित करती है। रिसर्च में पाया गया कि स्पेस जैसी परिस्थितियों में शुक्राणु सही दिशा में तैर नहीं पाते। जिससे निषेचन की संभावना लगभग 3 प्रतिशत तक कम हो जाती है। इस प्रयोग को सफल बनाने के लिए वैज्ञानिकों ने इसके लिए एक खास माइक्रोग्रैविटी सिमुलेशन चैंबर बनाया। इसमें देखा गया कि महिला प्रजनन तंत्र जैसा वातावरण कैसे तैयार करता है। इसमें देखा गया कि शुक्राणुओं को अंडाणु तक पहुंचने में कठिनाई होती है। अंतरिक्ष में मौजूद कॉस्मिक रेडिएशन भी प्रजनन के लिए खतरा है। यह डीएनए को नुकसान पहुंचा सकता है। साथ ही कैंसर का खतरा हो सकता है। माइक्रोग्रैविटी प्रजनन कोशिकाओं को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा, शरीर के हार्मोन सिस्टम को भी बदल देती है, जिससे शुक्राणु और अंडाणु दोनों की गुणवत्ता प्रभावित होती है। स्टडी में यह भी सामने आया कि प्रोजेस्टेरोन नाम का हार्मोन शुक्राणुओं को दिशा देने में मदद करता है। यह हार्मोन अंडाणु से निकलता है और एक तरह से सिग्नल का काम करता है, जिससे शुक्राणु सही दिशा में आगे बढ़ते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी इसे स्पेस में फिलहाल बच्चा पैदा करना मुश्किल है।





