जनप्रवाद ब्यूरो, नई दिल्ली। भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी को एक और कामयाबी हासिल हुई है। दशकों से जिसकी खोज दुनियाभर के वैज्ञानिक कई एजेंसियां कर रहे थे उसकी खोज हो गई है। चंद्रयान-2 ने चांद पर छिपे बर्फ के खजाने का पता लगा लिया है। इसे खोज से चन्द्रमा पर इंसानी बस्तियों का रास्ता आसान हो जाएगा।
चांद का बड़ा रहस्य उजागर
भारतीय अंतरिक्ष मिशनों की कामयाबी से दुनिया हैरान है। अब चंद्रयान-2 ने चांद को लेकर एक और बड़ा रहस्य उजाकर कर दिया है। वैज्ञानिकों को चंद्रमा के साउथ पोल के पास स्थित क्रेटर्स की सतह के नीचे भारी मात्रा में वॉटर-आइस के छिपे होने के पुख्ता सबूत मिले हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के अनुसार यह खोज अहमदाबाद स्थित फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी के वैज्ञानिकों ने की है। बता दें कि यह अहम खोज चंद्रयान-2 आॅर्बिटर में लगे डुअल फ्रीक्वेंसी सिंथेटिक अपर्चर रडार की मदद से हुई है। यह उपकरण माइक्रोवेव इमेजिंग तकनीक के जरिए चंद्रमा की सतह और उसके नीचे की संरचना का अध्ययन करता है। खास बात यह है कि यह चंद्रमा पर भेजा गया पहला पूरी तरह पोलारिमेट्रिक सिंथेटिक अपर्चर रडार है। यह एल-बैंड और एस-बैंड फ्रीक्वेंसी पर काम करता है।
चन्द्रयान-2 की आर्बिट से मिला डेटा
इसरो के अनुसार चन्द्रयान-2 की आर्बिट इस क्षेत्र में सालों से काम कर रहा था। कई बार यह डेटा भी भेज चुका है। ऐसे में इसी टेडा और आर्बिट से प्राप्त तस्वीरों का अध्ययन किया गया है। इसमें वैज्ञानिकों को पता चला कि चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव यानी साउथ पोल पर मौजूद फॉस्टिनी क्रेटर के भीतर स्थित लगभग 1.1 किलोमीटर चौड़े एक क्रेटर में बर्फ का भंडार है। शोधकर्ताओं के अनुसार इस क्रेटर में लोबेट-रिम मॉर्फोलॉजी जैसी विशेष संरचना भी देखी गई। यह किसी बहाव जैसी आकृति को दर्शाती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह संकेत हो सकता है कि उल्कापिंड का प्रभाव चंद्रमा की सतह के नीचे मौजूद बर्फ-समृद्ध परत तक पहुंचा था। यही वजह है कि वैज्ञानिक इस खोज को बेहद महत्वपूर्ण मान रहे हैं।
गड्ढों का किया अध्ययन
बता दें कि जिस फॉस्टिनी डबल शैडोड क्रेटर्स यानी गड्ढों का अध्ययन किया गया वे हमेशा अंधेरे में रहते हैं। ये क्रेटर स्थायी रूप से छाया वाले क्षेत्रों के भीतर स्थित हैं। यहां कभी सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती और न ही गर्मी का असर होता है। इस वजह से यहां का तापमान गिरकर लगभग 25 केल्विन, यानी माइनस 248 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। इतने अत्यधिक ठंडे तापमान के कारण ये क्षेत्र अरबों वर्षों से पानी की बर्फ को सुरक्षित रखने के लिए सबसे मुफीद जगह बने हुए हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह रिसर्च उन बढ़ते वैज्ञानिक प्रमाणों को और मजबूत करती है जिनमें चांद के ध्रुवीय क्षेत्रों में पानी या बर्फ की मौजूदगी की संभावना जताई गई थी। इससे पहले भी चंद्रयान-2 के अध्ययन में चंद्र सतह पर पानी के अणुओं और हाइड्रॉक्सिल के संकेत मिले थे। हाल के वर्षों में आॅर्बिटर ने हाई-रेजोल्यूशन पोलर मैप्स तैयार किए हैं, जिनकी मदद से बर्फ वाले क्षेत्रों की पहचान की जा रही है।
सिंथेटिक अपर्चर रडार का काम
इसरो के अनुसार चंद्रयान-2 के आॅर्बिटर में लगे डुअल फ्रीक्वेंसी सिंथेटिक अपर्चर रडार को एक बड़ी तकनीकी उपलब्धि माना जाता है। इसका कारण है कि यह चांद का अध्ययन करने वाला दुनिया का पहला पूर्ण पोलरिमेट्रिक सिंथेटिक अपर्चर रडार है। यह एल-बैंड और एस-बैंड दोनों फ्रीक्वेंसी पर काम करता है। 2019 में चंद्र कक्षा में पहुंचने के बाद से यह आॅर्बिटर हजारों डेटा सेट तैयार कर चुका है, जिनसे चांद की सतह और उसकी संरचना को समझने में मदद मिली है।
भविष्य के अभियानों का राहत
इस बारे में विशेषज्ञों का मानना है कि चांद पर बर्फ की मौजूदगी भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए गेमचेंजर साबित हो सकती है। पानी की बर्फ को पीने के पानी, आॅक्सीजन और यहां तक कि रॉकेट ईंधन में भी बदला जा सकता है। ऐसे में यह खोज लंबे समय तक चांद पर मानव मौजूदगी कायम करने की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। साथ ही यह खोज भविष्य में चांद पर इंसानी बस्तियां बसाने, पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने और अंतरिक्ष मिशनों के लिए ईंधन तैयार करने की दिशा में गेमचेंजर साबित हो सकती है। सौर मंडल के इस सबसे ठंडे और रहस्यमयी हिस्से में हुई इस खोज ने भविष्य के मानव मिशनों के लिए नई उम्मीदें जगा दी है।





