चीन ने की थी पाकिस्तान की मदद, ऑपरेशन सिंदूर पर चीन ने किया खुलासा

जनप्रवाद ब्यूरो, नई दिल्ली। चीन ने इस बात की पुष्टि की है कि पिछले साल भारत के खिलाफ लड़ाई में उसने पाकिस्तान की मदद की थी। यानी युद्ध के एक साल बाद पहली बार चीन ने पाकिस्तान को तकनीकी सहायता की बात स्वीकारी है। वहीं भारत शुरू से ही यह बात जानता था। अब चीन की नाक में दम करने के लिए भारत ने ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट इंडो-पैसिफिक के रूप में बड़ा प्लान तैयार किया है।
मीडिया रिपोर्ट में खुलासा 
साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट ने चीन के सरकारी ब्रॉडकास्टर सीसीटीवी ने झांग हेंग का इंटरव्यू दिखाया है। झांग ने इंटरव्यू में कहा कि उनके देश ने लड़ाई के दौरान पाकिस्तान को जे-10सीई विमान के लिए तकनीकी सहायता दी थी। बता दें कि झांग एविएशन इंडस्ट्री कॉर्पोरेशन आफ चाइना के चेंगदू एयरक्राफ्ट डिजाइन एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट में इंजीनियर हैं। यह संस्थान चीन में लड़ाकू विमानों और मानवरहित हवाई वाहनों का डेवलपर है। ऐसे में देखा जाए तो चीन ने भारत पाकिस्तान युद्ध के एक साल बाद पहली बार मदद देने की बात स्वीकारी है। बता दें कि भारत और पाकिस्तान के बीच बीते साल 7 से 10 मई तक चार दिन तक भीषण सैन्य संघर्ष देखने को मिला था। भारत ने पहलगाम के आतंकी हमले के बाद आॅपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान में हमले किए थे। चार दिन की लड़ाई के बाद 10 मई को दोनों पक्ष सीजफायर पर राजी हुए थे। दूसरी ओर भारत इस बात को पहले से ही जानता था कि चीन पाकिस्तान की मदद कर रहा है। अब भारत ने महत्वाकांक्षी ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट तैयार किया है। यह एक बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर प्लान है। इसका मकसद देश के सबसे दक्षिणी द्वीप को एक रणनीतिक कमर्शियल और मिलिट्री हब में बदलना है। इसे इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाने वाला कदम माना जा रहा है, खासकर चीन के लिए इसके बड़े असर हो सकते हैं। मीडिया में छपी रिपोर्ट के अनुसार ग्रेट निकोबार आइलैंड डेवलपमेंट प्रोजेक्ट भारत के लिए बड़ा मौका साबित होगा।

करीब दस बिलियन डॉलर का यह बड़ा प्रोजेक्ट भारत के इस द्वीप को एक बड़े व्यापारिक और सैन्य केंद्र में बदलने की योजना है। इससे इंडो-पैसिफिक में ताकत का संतुलन भी बदल जाएगा। यह द्वीप मलक्का स्ट्रेट के पास स्थित है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री रास्तों में से एक है। इस वजह से भारत को यहां से समुद्री व्यापार पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर असर डालने का बड़ा फायदा मिल सकता है। चीन का काफी तेल और व्यापार इसी रास्ते से गुजरता है, इसलिए यह उसकी रणनीति में एक कमजोर कड़ी मानी जाती है, जिसे मलक्का डिलेमा कहा जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रेट निकोबार का विकास भारत को पूर्वी हिंद महासागर में समुद्री ताकत बढ़ाने में मदद करेगा, उसकी सैन्य लॉजिस्टिक्स मजबूत करेगा और सिंगापुर और कोलंबो जैसे विदेशी बंदरगाहों पर निर्भरता कम करेगा। यह प्रोजेक्ट इंडो-पैसिफिक में भारत की मौजूदगी बढ़ाने और चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने की बड़ी रणनीति का हिस्सा है।

रणनीतिक फायदे के अलावा, यह प्रोजेक्ट आर्थिक रूप से भी काफी फायदेमंद हो सकता है। इससे यह द्वीप एक बड़ा लॉजिस्टिक्स और ट्रेड हब बन सकता है, जहां से वैश्विक शिपिंग ट्रैफिक आकर्षित होगा, रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और क्षेत्र में कनेक्टिविटी बेहतर होगी। यह भारत के लंबे समय के समुद्री विजन को भी सपोर्ट करेगा। इस प्रोजेक्ट को जरूरी मंजूरियां मिल चुकी हैं, जिनमें नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की मंजूरी भी शामिल है। ट्रिब्यूनल ने इसकी रणनीतिक अहमियत को मानते हुए कुछ सख्त पर्यावरणीय शर्तों के साथ इसे मंजूरी दी है। रिपोर्ट में यह भी जिक्र है कि यह प्रोजेक्ट चीन की समुद्री रणनीति को मुश्किल बना सकता है। इससे इंडो-पैसिफिक के अहम समुद्री मार्गों पर भारत की पकड़ मजबूत होगी। भौगोलिक नजरिए से देखें तो अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, जो करीब 700 किलोमीटर तक फैला है, मलक्का स्ट्रेट के प्रवेश द्वार पर एक तरह से प्राकृतिक एयरक्राफ्ट कैरियर जैसा है, जो भारत को उसकी भौगोलिक स्थिति के कारण मिला है। इस श्रृंखला का सबसे दक्षिणी द्वीप ग्रेट निकोबार है, जो सिंगापुर, पोर्ट क्लांग और कोलंबो से लगभग बराबर दूरी पर स्थित है। यह द्वीप सिर्फ मलक्का स्ट्रेट के पास ही नहीं है, बल्कि उसके उत्तरी हिस्से पर एक तरह से नियंत्रण रखता है।