सोना न खरीदने की अपील का रहा पुराना इतिहास, कांग्रेस ने घोषित किया था अपराध

जनप्रवाद ब्यूरो, नई दिल्ली। पीएम मोदी ने देशवासियों से एक साल तक सोना न खरीदने की अपील की थी। इस अपील के 24 घंटे बाद ही सरकार ने सोने के साथ ही चांदी पर भी कस्टम ड्यूटी बढ़ा दी है। इससे देश में सोने और चांदी के भावो में जबर्दस्त उछाल आ गया है। विपक्षी दलों ने सरकार के इस कदम की आलोचना की है। ऐसे में यहां जानना जरूरी हो जाता है कि क्या देश में पहली बार किसी पीएम ने सोना न खरीदने की अपील की है।
सोना और चांदी पर बढ़ा आयात शुल्क 

केंद्र सरकार ने सोना और चांदी पर आयात शुल्क 6 फीसदी से बढ़ाकर सरकार ने अब 15 प्रतिशत कर दिया है। सरकार ने सोना और चांदी के आयात पर 10 प्रतिशत बेसिक कस्टम ड्यूटी भी लगाई है। इस पर 5 प्रतिशत सेस लगाया है। इससे राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में सोने की कीमत मंगलवार को 1,500 रुपये यानी लगभग एक प्रतिशत बढ़कर 1,56,800 रुपये प्रति 10 ग्राम हो गई। वहीं चांदी की कीमत 12,000 रुपये यानी 4.53 प्रतिशत बढ़कर 2,77,000 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई। अंतरराष्ट्रीय बाजार में, हाजिर सोने की कीमत 42.33 डॉलर यानी एक प्रतिशत घटकर 4,692 डॉलर प्रति औंस पर रही। बता दें कि भारत का सोने का आयात 2025-26 में 24 प्रतिशत से अधिक बढ़कर अपने उच्चतम स्तर 71.98 अरब डॉलर पर पहुंच गया। 
पीएम मोदी पर कांग्रेस का पलटवार

देखा जाए तो पश्चिम एशिया संकट के मद्देनजर नागरिकों से संयम बरतने की पीएम मोदी की अपील का कांग्रेस मजाक उड़ा रही है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि कांग्रेस की सरकारों ने तो सोना रखना ही अपराध घोषित कर दिया था। देशभक्ति का हवाला देकर नागरिकों से गहने दान करने, अनाज त्यागने और सोमवार को उपवास करने तक को कहा था। इसकी शुरुआत 1962 से होती है। चीन से युद्ध के दौरान अर्थव्यवस्था दबाव में थी। तब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने नागरिकों से राष्ट्रव्यापी अभियान चलाकर देशभक्ति का हवाला देते हुए राष्ट्रीय युद्ध कोष में आभूषण दान करने का आग्रह किया। 1962 के स्वर्ण नियंत्रण अधिनियम के तहत सोने के स्वामित्व और व्यापार पर व्यापक प्रतिबंध लगाए गए। 1963 तक 14 कैरेट से अधिक शुद्धता वाले आभूषणों का उत्पादन आपराधिक कृत्य बन दिया गया था। इसके बाद 1968 में कानून के तहत सोने की छड़ें या सिक्के रखने को कानूनी रूप से प्रतिबंधित कर दिया गया। 1966 में इंदिरा गांधी सरकार ने सोने के खिलाफ जंग का एलान कर दिया। सितंबर 1966 में संसद में कहा, भारत की सोने की लत को तोड़ने के लिए राजकोषीय नीति और जन शिक्षा, दोनों को हथियार बनाया जाएगा। उन्होंने सोने की खरीद को विदेशी मुद्रा की बबार्दी बताया था। कुछ दिन बाद ही राष्ट्र के नाम संबोधन में उन्होंने कहा, हम सोने के गुलाम न बनें। इसके बाद 2013 में मनमोहन सिंह के कार्यकाल में जीडीपी रिकॉर्ड 5.4 प्रतिशत तक पहुंच गया। उस समय तत्कालीन वित्त मंत्री ने तीन महीने के भीतर चार बार लोगों से सोना न खरीदने की अपील की थी। पहली अपील, मार्च 2013 में आम बजट के अगले दिन आई। उन्होंने कहा कि उम्मीद है लोग इतना सोना नहीं खरीदेंगे। फिर मई और जून में तीन और मौकों पर उन्होंने लोगों से ऐसी ही अपील की। उन्होंने इस आदत को राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को होने वाले नुकसान से जोड़ा। 
मनमोहन सरकार ने की थी अपील

दूसरी ओर कांग्रेस पीएम मोदी के पेट्रोल-डीजल बचाने और यात्रा कम करने की अपील को आर्थिक कमजोरी का सबूत बता रही है। वहीं वह खुद का इतिहास भूल जाती है। मनमोहन सरकार में जब ईंधन पर सब्सिडी से राजकोषीय घाटा बढ़ने का खतरा मंडरा रहा था, तब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी जनता से अपील की थी। उन्होंने कहा था कि विश्व स्तर पर ईंधन की कीमतें बढ़ रही हैं, हमने आपको बचाने की कोशिश की है। ईंधन पर सब्सिडी बहुत अधिक है। सब्सिडी का बिल 2 लाख करोड़ रुपये से भी अधिक है। इसके लिए पैसा कहां से आएगा? पैसा पेड़ों पर नहीं उगते।