जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। फ्रांस और इटली में हाल के प्रदर्शनों ने यूरोप की सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों को फिर चर्चा में ला दिया है। दूसरी ओर एसआईआर के खिलाफ प्रदर्शनों के बीच केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने बड़ा आरोप लगाया। उन्होंने आरोप लगाया कि भारत में हिंसा भड़काने की साजिश रची गई थी। भारत न बांग्लादेश है, न फ्रांस है। वहीं अब सीजेपी के खिलाफ लाल हिट गैंग उतरने वाली है।
सार्वजनिक सेवाओं में गिरावट
महंगाई, बढ़ती असमानता और सार्वजनिक सेवाओं में गिरावट के खिलाफ फ्रांस में हिंसक प्रदर्शन उग्र हो गया। राजधानी पेरिस के अलावा मार्सेय, ल्योन, बोर्डो, रीम्स समेत कई शहरों में हर तरफ दुकानों, सार्वजनिक संपत्तियों, ऐतिहासिक स्थानों में आगजनी, तोड़फोड़ और लूटपाट के निशान साफ नजर आ रहे हैं। लिमोन शहर 143 साल पुरानी सिटी हाल की ऐतिहासिक इमारत से धुआं उठता देखा गया। अनुमान के अनुसार देशभर में पांच लाख से अधिक लोगों के सड़कों पर उतरे। गृह मंत्री के अनुसार, दो हजार से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया और 600 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हुए। हिंसा के बाद कई शहरों में सफाई और नुकसान का आकलन शुरू किया गया है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैंक्रो ने ट्वीट कर कहा कि हमारे गणतंत्र में हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है। जिन लोगों ने सरकारी कार्यालयों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों पर हमला एवं टाउन हॉल में लूटपाट की है उन पर एक्शन लिया जाएगा। सरकार उन पर मुकदमा चलाएगी। उन्हें कानून के तहत दंडित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि प्रदर्शन करने के अधिकार की रक्षा करने वाली कानून प्रवर्तन एजेंसियों के प्रति मैं पूरे राष्ट्र की ओर से अपना समर्थन जताता हूं।
उपराष्ट्रपति जेडी वेंस का बयान
अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी जलते हुए पुराने ऐतिहासिक टाउन हॉल का वीडियो ट्वीट कर इसकी अलोचना की है। उन्होंने कहा कि पश्चिम के कुछ उदारवादियों ने विविधता और दया के नाम पर तीसरी दुनिया के लोगों को फ्रांस और दूसरे देशों में बसा दिया। उन्होंने इस दौरान उनके आत्मसात होने और मेल-जोल से जुड़े बुनियादी सवालों को नजरअंदाज कर दिया। उन्हें कहा पहले ही चेतावनी दी गई थी कि ऐसा हो सकता है, लेकिन उन्होंने किसी की नहीं सुनी।
बुर्का बैन से जोड़कर देखी जा हिंसा
दूसरी ओर फ्रांस में हुई हिंसा को बुर्का बैन से जोड़कर देखा जा रहा है। बता दें कि सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा पूरी तरह ढकने वाले कपड़ों पर प्रतिबंध लगाने वाला कानून 2010 में पारित हुआ था। यह अप्रैल 2011 से लागू हुआ। इस कानून को लेकर फ्रांस में लंबे समय से बहस होती रही है। इसके समर्थक इसे सार्वजनिक जीवन, सुरक्षा और धर्मनिरपेक्षता से जोड़ते हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि इससे धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। फ्रांस में प्रवासन, सामाजिक एकीकरण और धार्मिक पहचान से जुड़े मुद्दे भी राजनीतिक बहस का हिस्सा रहे हैं। इसलिए बुर्का बैन का मुद्दा फ्रांस के सामाजिक और राजनीतिक माहौल को समझने के लिए महत्वपूर्ण है। क्योंकि इसी फैसले से धीरे-धीरे कई लोगों के अंदर आग सुलग रही थी।
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू की पहल
दूसरी ओर केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शनों को लेकर विपक्ष पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दावा किया कि भारत में हिंसा भड़काने और युवाओं को उकसाने की साजिश रची गई थी। रिजिजू ने बांग्लादेश में हुई हिंसक घटनाओं और फ्रांस में दंगों, आगजनी तथा लूटपाट का जिक्र करते हुए कहा कि भारत न तो बांग्लादेश है और न ही फ्रांस। रिजिजू ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट में आरोप लगाया कि कुछ नेताओं और भारत विरोधी समूहों ने मिलकर युवाओं को भड़काने तथा सड़कों पर हिंसा फैलाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि भारत में सत्ता परिवर्तन संभव है, लेकिन यह चुनाव के जरिए ही हो सकता है। उन्होंने अपने बयान में जॉर्ज सोरोस का भी जिक्र किया। रिजिजू ने एक वीडियो भी साझा किया जिसमें आइसा की अध्यक्ष नेहा बोरा और वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण सत्ता परिवर्तन की बात करते दिखाई देते हैं। रिजिजू ने अपने बयान में बांग्लादेश में हुई हिंसक घटना और फ्रांस में दंगों, आगजनी तथा लूटपाट का उल्लेख किया। उन्होंने आरोप लगाया कि इसी तरह की स्थिति भारत में पैदा करने की साजिश रची गई थी। उनके मुताबिक, कुछ समूहों और नेताओं ने युवाओं को उकसाकर सड़कों पर हिंसा फैलाने की कोशिश की। दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शनों के बीच लाल हिट जनता पार्टी ने बैठक की। मालवीय स्मृति भवन में हुई इस बैठक में लोकतांत्रिक जवाबदेही, सांविधानिक मूल्यों, राष्ट्रीय विकास और जिम्मेदार नागरिक भागीदारी जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई। संगठन ने सीजेपी के विरोध प्रदर्शनों पर अपनी असहमति जताई। लाल हिट जनता पार्टी ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर चुनाव आयोग सहित सांविधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता बनाए रखने पर जोर दिया। संगठन का कहना है कि चुनावी प्रक्रिया को लेकर होने वाली बहस प्रमाणित साक्ष्यों, पारदर्शी प्रक्रियाओं और संवैधानिक व्यवस्था के आधार पर होनी चाहिए।





