जनप्रवाद ब्यूरो, नई दिल्ली। डीआरडीओ की रामगढ़ स्थित टीबीआरएल लैब में वायुसेना की मौजूदगी में एक विनाशकारी हाई-कैलिबर बम का सफल परीक्षण किया। हाई विस्फोटक रसायनों से लैस इस बम को खतरनाक बंकरों और सैन्य ठिकानों को तबाह करने के लिए डिजाइन किया गया है। यह टेस्ट इतना प्रचंड था कि इसके टुकड़े हवा में 1.5 किलोमीटर ऊंचे और 2 किमी के दायरे में बिखर गए। जिसके चलते नजदीकी गांवों में हाई अलर्ट जारी करना पड़ा था।
सैन्य क्षमताओं में लगातार इजाफा
आपरेशन सिंदूर के बाद से भारत अपनी सैन्य क्षमताओं में लगातार कर रहा है। देश की सेना नई तकनीक के साथ आने वाले युद्धों और दुश्मनों से निपटने की तैयारी कर रही है। इसी क्रम में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ ने एक और सफलता हासिल की है। टर्मिनल बैलिस्टिक्स रिसर्च लेबोरेटरी ने हरियाणा के पंचकूल के रामगढ़ स्थित डीआरडीओ यूनिट में एक हाई-कैलिबर बम का परीक्षण किया। यह परीक्षण वायुसेना के आधिकारियों की देखरेख में संपन्न हुआ। अधिकारियों के अनुसार हाई-कैलिबर बम का परीक्षण सफल रहा। इसे परीक्षण को सुरक्षा प्रोटोकॉल के तहत अंजाम दिया गया। परीक्षण के दौरान बम के टुकड़े 1.5 किलोमीटर की दूरी तक उड़ते हुए दिखाए दिए। बता दें कि सुरक्षा की दृष्टि से 2 किलोमीटर के दायरे को संवेदनशील क्षेत्र घोषित करते हुए पहले ही खाली करा लिया गया था। इस महापरीक्षण के बाद हर कोई यह जानने को उत्सुक है कि आखिर यह हाई-कैलिबर बम क्या होता है। इसे किस तकनीक से बनाया जाता है। यह भविष्य के युद्धों में भारतीय वायुसेना के फाइटर जेट्स और मिसाइलों को कितनी विनाशकारी संहारक क्षमता प्रदान करेगा।
कई अर्थों में कैलिबर शब्द का इस्तेमाल
सैन्य विज्ञान और हथियारों की भाषा में कैलिबर शब्द का इस्तेमाल कई अर्थों में किया जाता है। किसी भी बड़े बम और मिसाइल की मारक क्षमता और उसके वजन के अनुपात को दशार्ने के लिए कैलिबर शब्द का प्रयोग किया जाता है। ऐसे में यह समझा जा सकता है कि जब भी हाई-कैलिबर बम की बात होती है तो यह मान लेना चाहिए कि यह बम बेहद खतरनाक होने के साथ घातक मारक क्षमता से लैस है। इस बम में पारंपरिक विस्फोटकों की तुलना में बहुत अधिक मात्रा में उन्नत और उच्च-तीव्रता वाले रसायन भरे होते हैं। ये बम आकार में बहुत बड़े होते हैं और इन्हें विशेष रूप से बंकरों, सैन्य अड्डों, रनवे और दुश्मन के बड़े बुनियादी ढांचे को मटियामेट करने के लिए डिजाइन किया जाता है। चंडीगढ़ के रामगढ़ स्थित की इस लैब में जब इस बम को फोड़ा गया तो इसके शॉक वेव्स और टर्मिनल इफेक्ट्स का डेटा रिकॉर्ड किया गया। आम बमों के फटने पर उनके टुकड़े कुछ मीटर या ज्यादा से ज्यादा आधा किलोमीटर तक जाते हैं। वहीं इस हाई-कैलिबर बम की क्षमता इतनी प्रचंड थी कि इसके टुकड़े आसमान में 1.5 किलोमीटर ऊपर तक चले गए। ये चारों तरफ 2 किलोमीटर के रेडियस में बिखर गए। यही वजह थी कि प्रशासन को पास के भानू और बिल्ला गांवों में सुरक्षा अलर्ट जारी करना पड़ा था। इस परीक्षण के दौरान वायुसेना के बड़े अफसरों की मौजूदगी कई बात का संकेत द रही है। इससे पता चलता है कि इस बम का प्रयोग फाइटर जेट्स के जरिए किया जाएगा। फाइटर जेट के जरिए इस बम को ऊपर से दुश्मन के बंकरों या उनके सैन्य ठिकानों पर छोड़ा जाएगा। इसके अलावा इस बम का प्रयोग एयर-ड्रॉप म्यूनिशन्स या फिर लंबी दूरी की मिसाइलों के वॉरहेड यानी युद्धक सामग्री के रूप में किया जाएगा।
अन्य देशों का मोहताज नहीं रहेगा भारत
बता दें कि आज के समय में चीन और पाकिस्तान जैसे देशों ने सीमा पर कंक्रीट के मजबूत अंडरग्राउंड बंकर और कमांड सेंटर बनाए है। पारंपरिक बम इन्हें भेद नहीं पाते। अब जिस बम का भारत ने प्रयोग किया है यह हाई-कैलिबर बम अपनी उच्च शॉक वेव तकनीक के जरिए जमीन के अंदर गहरे धंसे बंकरों को नेस्तोनाबूत कर देगा। इस परीक्षण का सबसे बड़ा फायदा यह है कि दुश्मनों से निपटने के लिए भारत अन्य देशों का मोहताज नहीं रहेगा।





