जनप्रवाद ब्यूरो, नई दिल्ली। वैज्ञानिकों ने बेहद चौंकाने वाला खुलासा किया है। शोध के अनुसार लाखों साल पहले भारत अंटार्कटिका से जुड़ा हुआ था। पुरानी चट्टानों के अध्ययन से एशिया और भारत के अलग होने का खुलासा हुआ है।
11,835 किलोमीटर है दूरी
भौगोलिक दृष्टि से भारत और अंटार्कटिका महाद्वीप के बीच की दूरी लगभग 11,835 किलोमीटर है। यह पृथ्वी का सबसे ऊंचा और शुष्क क्षेत्र माना जाता है। इसके अलावा इसे सबसे ठंडा और सबसे हवादार महाद्वीप भी कहा जाता है। अंटार्कटिका का क्षेत्रफल 14.2 मिलियन वर्ग किलोमीटर यानी 5.5 मिलियन वर्ग मील है। अंटार्कटिक हिम चादर पृथ्वी पर बर्फ का सबसे बड़ा भंडार है। अब इस महाद्वीप को लेकर वैज्ञानिकों के अध्ययन में बेहद चौंकाने वाली जानकारी सामने आई है। भारत, आस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया के वैज्ञानिकों ने मिलकरी नई रिसर्च की है। अध्यययनकर्ताओं का कहना है कि भारत लाखों साल पहले अंटार्कटिका का हिस्सा हुआ करता था। वैज्ञानिकों ने अपनी नई स्टडी में पाया कि लाखों साल पहले ये महाद्वीप एक-दूसरे से अलग हुए थे। उससे पहले भारत और अंटार्कटिका एक विशाल प्राचीन पर्वत श्रृंखला के जरिए आपस में जुड़े हुए थे। आंध्र प्रदेश के विजयनगरम-सालूर इलाके की प्राचीन चट्टानों के अध्ययन से पता चलता है कि उनमें और पूर्वी अंटार्कटिका में पाई जाने वाली चट्टानों में काफी समानता है।
प्राकृतिक और गणितीय विज्ञान का सिद्धांत
कोलकाता की प्रेसिडेंसी यूनिवर्सिटी में प्राकृतिक और गणितीय विज्ञान संकाय के डीन प्रोफेसर शंकर बोस इस टीम का हिस्सा हैं। उनके अनुसार रिसर्च टीम ने ग्रैनुलाइट का अध्ययन किया, जो एक तरह की मेटामॉर्फिक चट्टानें हैं। ये पृथ्वी के बहुत अंदर बहुत ज्यादा गर्मी और दबाव में बनती हैं। ये चट्टानें उन घटनाओं के सुराग सहेजकर रखती हैं, जो अरबों साल पहले हुई थीं। बोस का कहना है कि जिरकॉन, गार्नेट और मोनाजाइट जैसे खनिजों का विश्लेषण करने के लिए खनिज परीक्षण की आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया। अध्ययन के अनुसार अंटार्कटिका से भारत के अलग होने की शुरुआत का पहला चरण 1,000 से 990 मिलियन वर्ष पहले हुआ था। उस समय एक बड़े महाद्वीपीय टकराव के दौरान चट्टानें 1,000 डिग्री सेल्सियस के करीब तापमान के संपर्क में आई थीं। इससे विशाल पर्वत श्रृंखला का निर्माण हुआ। दूसरा चरण 950 से 890 मिलियन वर्ष के बीच हुआ, उसमें चट्टानों के अंदर अधिक गर्मी और संरचनात्मक परिवर्तन शामिल थे। आखिरी यानी तीसरा चरण 570 से 540 मिलियन वर्ष पहले हुआ, जब खनिज समृद्ध तरल पदार्थ चट्टानों की दरारों से होकर गुजरे और एक विशिष्ट रासायनिक निशान छोड़ गए, जो भारत और अंटार्कटिका दोनों में हैं।
पत्थरों में जिरकॉन सबसे अहम
वैज्ञानिकोें के अनुसार जिन पत्थरों का अध्ययन किया गया उसमें जिरकॉन सबसे अहम है। यह काफी मजबूत पत्थर होता है। यह बहुत गर्मी और दबाव में टिका रहता है, जबकि दूसरे खनिज नष्ट हो जाते हैं। अपनी इसी मजबूत प्रकृति के कारण जिरकॉन इन चट्टानों के भीतर एक छोटे टाइम कैप्सूल की तरह काम करता है। जिरकॉन क्रिस्टल के भीतर यूरेनियम और लेड जैसे रेडियोधर्मी तत्वों के क्षय का अध्ययन किया गया। इससे उन घटनाओं की सटीक जानकारी मिली, जो करोड़ों से लेकर अरबों साल पहले पूर्वी घाट क्षेत्र में घटित हुई थीं। वैज्ञानिकों ने पाया कि आंध्र प्रदेश और पूर्वी अंटार्कटिका की चट्टानों की उम्र, खनिजों की बनावट और रासायनिक विशेषताएं एक जैसी हैं। इन दोनों ही क्षेत्रों में भूवैज्ञानिक विकास के तीन प्रमुख चरणों के एक जैसे प्रमाण मिले हैं। विजयनगरम और सालुर की चट्टानों ने भूवैज्ञानिक इतिहास के उन्हीं तीन मुख्य चरणों को दर्ज किया है, जिनकी पहचान पहले ही पूर्वी अंटार्कटिका में की जा चुकी है।





