जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। समंदर की गहराई में दूसरी दुनिया दबी है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस गहराई में एक दो नहीं बल्कि 12000 एलियन रहते हैं। इस नई खोज ने शोधकर्ताओं के भी होश उड़ा दिए हैं। वैज्ञानिक अब इस बात का आकलन कर रहे हैं कि ये ऐलियंस इंसानों के लिए कितने खतरनाक हैं।
सतह से नीचे उतरते ही बदलती है दुनिया
समुद्र की सतह से नीचे उतरते ही दुनिया तेजी से बदलने लगती है। करीब 200 मीटर की गहराई के बाद रोशनी कम होने लगती है। वहीं 1,000 मीटर के नीचे सूरज की रोशनी लगभग पूरी तरह गायब हो जाती है। इसके बावजूद समुद्र की इन गहराइयों में मछलियां, झींगे, जेलीफिश और कई अनोखे जीव अपना जीवन जीते हैं। इन सबके बीच वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर अंतरिक्ष की दुनिया में रहस्य छिपे हुए हैं, तो समंदर में भी कम राज नहीं है। अब वैज्ञानिकों को समंदर की गहरी तलहटी में ऐसी जगह मिली है जहां ऐसे एलियन छिपे हुए हैं। जिन्हें आज तक किसी भी साइंटिस्ट ने न देखा है और न इसके बारे में सुना है।
करीब 12 हजार एलियन
वैज्ञानिकों के अनुसार यहां एक-दो नहीं बल्कि करीब 12 हजार एलियन हैं। इन्हें एलियन इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि इनमें से 99 प्रतिशत से ज्यादा को वैज्ञानिक पहचान नहीं पाए। बता दें कि चीन की चोंगकिंग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने प्रशांत महासागर के क्लेरियन-क्लिपर्टन जोन में अब तक 11662 नए वायरल समूहों की पहचान की है। यह विशाल समुद्री क्षेत्र मैक्सिको और हवाई के बीच स्थित है। शोधकर्ताओं के अनुसार यहां की गहराई लगभग 6000 मीटर है। वैज्ञानिकों के अनुसार गहरे समुद्र में सिर्फ अंधेरा ही नहीं होता, बल्कि तापमान भी बहुत कम रहता है। करीब 200 मीटर से नीचे समुद्री पानी का औसत तापमान लगभग 4 डिग्री सेल्सियस होता है। ऐसे में वहां रहने वाले जीवों को अंधेरे और कम भोजन के साथ बेहद ठंडे वातावरण में भी खुद को ढालना पड़ता है। ऐसे में सूरज की रोशनी से दूर इस अंधेरी दुनिया में जीवन किस तरह पनपता है, यह वैज्ञानिकों के लिए लंबे समय से दिलचस्प सवाल रहा है। इस क्षेत्र की तलहटी पर आलू के आकार जैसी लाखों धातुओं से भरी हुई चट्टानें बिखरी हुई हैं। इन्हें पॉलीमेटैलिक नोड्यूल कहा जाता है। इनमें कोबाल्ट, निकेल और मैंगनीज जैसी धातुएं मौजूद हैं, जिनकी जरूरत इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियां बनाने में पड़ती है। यही वजह है कि इस समुद्री इलाके में खनन को लेकर दुनिया की दिलचस्पी बढ़ रही है। चीन के वैज्ञानिक भी यहां खनन की संभावनाओं की तलाश कर रहे थे उसी दौरान उनको चट्टानों के आसपास एक माइक्रोवर्ल्ड मिला। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस क्षेत्रा का बड़ा हिस्सा अभी तक अनजाना है।
तलहटी से जुटाए गए नमूने
बता दें कि यह खोज इसलिए दिलचस्प है क्योंकि वैज्ञानिकों ने समुद्र की तलहटी से जुटाए गए 60 से ज्यादा सीबेड नमूनों का विश्लेषण किया। जांच में सामने आया कि इन एलियंस वायरसों की आनुवंशिक बनावट पहले से उपलब्ध वैज्ञानिक आंकड़ों से काफी अलग है। वैज्ञानिकों को चिंता है कि बड़े पैमाने पर समुद्री खनन से तलहटी की मिट्टी उखड़ सकती है। इंसानों पर इनके खतरे की बात करें तो इन वायरसों को फिलहाल इंसानों की सेहत के लिए खतरा नहीं माना जा रहा है। इससे इनकार नहीं कर सकते हैं कि समुद्र के इकोसिस्टम में इनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। ये माइक्रोआर्गेनिज्म की संख्या नियंत्रित करने और कार्बन, नाइट्रोजन, फॉस्फोरस और सल्फर जैसे नेचुरल साइकल को बनाए रखने में मदद करते हैं। यह खोज याद दिलाती है कि समुद्र की गहराइयों में अभी भी अनगिनत रहस्य छिपे हैं, जहां तक इंसान पहुंच नहीं सका है।





