99 प्रतिशत तक सिमटा ये खास ग्लेशियर्स, 2030 तक पूरी तरह गायब हो जाएगा हिमनद
जनप्रवाद ब्यूरो, नई दिल्ली। अली नीनो के बाद एक और बेहद खतरनाक रिपोर्ट ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। नए वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, ग्रीनलैंड के दक्षिण में स्थित ठंडा समुद्री क्षेत्र वायुमंडलीय परिसंचरण और जेट स्ट्रीम को प्रभावित कर रहा है। दूसरी ओर रिपोर्ट में दावा किया गया है कि एशिया के अंतिम उष्णकटिबंधीय ग्लेशियर्स 99 प्रतिशत तक सिमट चुके हैं। 2030 तक हिमनद पूरी तरह गायब हो जाएंगे।
वैज्ञानिकों का नया अध्ययन
दुनिया में बढ़ते तापमान और अल नीनो के घातक गठजोड़ के कारण एशिया के आखिरी उष्णकटिबंधीय ग्लेशियर अपने वजूद की अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं। इंडोनेशिया के पापुआ में स्थित पुंचक जया पर्वत के इन ग्लेशियरों का आकार 99 फीसदी तक सिकुड़ चुका है। इंडोनेशिया के पापुआ विश्वविद्यालय से जुड़े वैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार साल 1850 में पुंचक जया के हिमनदों का कुल क्षेत्रफल लगभग 19.3 वर्ग किमी था। यह 3,500 फुटबॉल मैदानों यानी 19.3 वर्ग किमी जितने विशाल थे। वे अब सिमटकर महज 40 मैदानों यानी 0.23 वर्ग किलोमीटर जितने रह गए हैं। बढ़ते वैश्विक तापमान और बार-बार आने वाले अल नीनो ने इस विनाश को और तेज कर दिया है। 2015-16 के अल नीनो के दौरान ग्लेशियरों के पतले होने की दर पांच गुना बढ़ गई थी। स्टडी रिपोर्ट से पता चला है कि पिछले 44 वर्षों में यहां की 97 फीसदी बर्फ गायब हो चुकी है। अब बचे हुए आखिरी दो ग्लेशियर भी 2030 के बीच पूरी तरह इतिहास बन सकते हैं। यानी ये समाप्त हो जाएंगे।
छह प्रमुख हिमनद मौजूद
शोधकर्ताओं के अनुसार कभी इस क्षेत्र में छह प्रमुख हिमनद मौजूद थे। अब उनमें से केवल दो कार्स्टेंज और ईस्ट नॉर्थवॉल फर्न ही बचे हैं। वैज्ञानिकों का कहना हैकि वैश्विक तापमान में वृद्धि हिमनदों के क्षरण का मुख्य कारण है, लेकिन इंडोनेशिया में अल नीनो ने इस प्रक्रिया को और तेज कर दिया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह केवल एक स्थानीय पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि दुनिया भर में ग्लेशियरों पर बढ़ते जलवायु दबाव की गंभीर चेतावनी है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार इससे स्थानीय पापुआ आदिवासियों के अस्तित्व पर भी संकट के बादल मंडराने लगे हैं। स्थानीय लोग जिस बर्फ को सदियों से सल्जू अबादी यानी अनंत बर्फ कहते आ रहे थे और जिसे अपने पूर्वजों का पवित्र निवास मानकर पूजते थे, उसका पिघलना उनकी आध्यात्मिक पहचान का मिट जाना है। वैज्ञानिकों ने इसे दुनिया के लिए कोयले की खान में कैनरी यानी एक शुरूआती चेतावनी माना है। वैज्ञानिकों के अनुसार अगर इसांन नहीं चेता तो पूरी दुनिया के बड़े ग्लेशियर और उन पर टिकी मानव आबादी भी सुरक्षित नहीं रहेगी। वैज्ञानिकों का कहना है कि पापुआ के हिमनदों का तेजी से गायब होना इस बात का संकेत है कि जलवायु परिवर्तन अब पृथ्वी के सबसे संवेदनशील प्राकृतिक तंत्रों को प्रभावित कर रहा है। उनका मानना है कि यदि वैश्विक तापमान वृद्धि की मौजूदा प्रवृत्ति जारी रही तो दुनिया के अन्य पर्वतीय हिमनद भी इसी तरह सिकुड़ते जाएंगे, जिससे उन पर निर्भर पारिस्थितिकी तंत्रों और मानव समुदायों के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।





