बाहर आएंगे शुक्र ग्रह के बड़े राज, स्वीडन का खास यंत्र करेगा कमाल

जनप्रवाद ब्यूरो, नई दिल्ली। पृथ्वी जैसी दिखने वाली दूसरी दुनिया यानी शुक्र ग्रह का बड़ा राज अब दुनिया के सामने होगा। पीएम मोदी के दौरे के समय भारत और स्वीडन ने शुक्रयान-1 मिशन के लिए समझौता किया है। स्वीडन का एक खास यंत्र इसरो के 2028 के शुक्र मिशन पर उड़ेगा। यह शुक्र ग्रह के वायुमंडल का अध्ययन करेगा।
शुक्र ग्रह पर है नजरें

चंद्रयान-3 और आदित्य-एल 1 की सफलता के बाद भारत की नजरें अब शुक्र ग्रह पर है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस ग्रह पर खोज के लिए कई विषय मौजूद हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इस ग्रह पर रिसर्च को तैयार है। इसके लिए इसरो शुक्रयान-1 मिशन लांच करेगा। भारत के पहले शुक्र मिशन की लाचिंग मार्च 2028 में प्रस्तावित है। इस मिशन में कुल 19 वैज्ञानिक पेलोड लगाए जाएंगे। जिनमें कई देशों के यंत्र शामिल किए जाएंगे। मिशन की अवधि पांच साल होगी। इस दौरान वैज्ञानिक शुक्र ग्रह की सतह, उसके मोटे बादलों और सूर्य के साथ उसके संबंधों का अध्ययन करेंगे।  पीएम मोदी के स्वीडन दौरे के बाद इसरो का शुक्रयान मिशन अब और मजबूत हो गया है। भारत और स्वीडन ने इस मिशन के लिए समझौता किया है। यानी इस मिशन में अब स्वीडन भी शामिल हो गया है। मिशन के दौरान स्वीडन इसरो को एक खास वैज्ञानिक उपकरण देगा। इस यंत्र का नाम वेनिस नेचुरल एनालाइजर है। यह यंत्र शुक्र ग्रह पर स्थित सौर कणों का पता लगाएगा और समझाएगा कि ये कण शुक्र के वायुमंडल को कैसे प्रभावित करते हैं। इस अध्ययन से वैज्ञानिकों को शुक्र ग्रह की जलवायु, उसके वायुमंडल के विकास और सौर मंडल के अन्य ग्रहों के बारे में बेहतर जानकारी मिल सकेगी। साथ ही इसके जरिए शुक्र ग्रह के वातावरण और वहां होने वाले बदलावों का भी अध्ययन किया जा सकेगा।
पृथ्वी का सबसे निकटतम पड़ोसी ग्रह है शुक्र

वैज्ञानिकों के अनुसार शुक्र पृथ्वी का सबसे निकटतम पड़ोसी ग्रह है। इसके बाद भी इस ग्रह पर अध्ययन या शोध करना आसान काम नहीं है। इसकी वजह यहां का तापमान है। शोधकर्ताओं के अनुसार यहां की सतह का तापमान 460 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। इसके अलावा उसका वायुमंडल बेहद घना और जहरीला है। यही कारण है कि इस ग्रह पर शोध करना बेहद जटिल और कठिन काम माना जाता है। 
शुक्रयान-1 मिशन भारत की बढ़ती ताकत

 

बता दें कि शुक्रयान-1 मिशन भारत की बढ़ती वैश्विक अंतरिक्ष क्षमता को दर्शाता है। यह इस बात का प्रमाण है कि इसरो अब केवल चंद्रमा और मंगल तक सीमित नहीं है, बल्कि सौर मंडल के अन्य ग्रहों की ओर भी कदम बढ़ा रहा है। इस मिशन की सफलता भारत को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष सहयोग के नक्शे पर और मजबूती से स्थापित करेगी।  कई देशों के 19 पेलोड के साथ यह मिशन वैश्विक सहयोग का बेहतरीन उदाहरण बनेगा। यह मिशन न सिर्फ वैज्ञानिक खोज के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि भारत की आत्मनिर्भरता और वैश्विक नेतृत्व की दिशा में भी एक बड़ा कदम है। मार्च 2028 में जब शुक्रयान-1 लॉन्च होगा, तो पूरी दुनिया इसकी ओर देखेगी।