जनप्रवाद ब्यूरो नई दिल्ली। ईरान के साथ युद्ध के बीच अमेरिका में बड़ी आफत आने वाली है। यह मुश्किल इतनी बड़ी है कि 1950 के बाद हेल्थ एमरजेंसी लगानी पड़ सकती है। यह किसी आसमानी ताकत या परमाणु बम के कारण नहीं हो रहा है बल्कि वहां एक ऐसी मक्खी ने प्रवेश किया है जो इंसानों को कच्चा चबा जाती है।
दुनिया भर में मांस खाने वाली मक्खी के नाम से मशहूर न्यू वर्ल्ड स्क्रूवर्म तेजी से अमेरिका की सीमा की ओर बढ़ रही है। यह परजीवी मक्खी जानवरों और इंसानों के घावों में अंडे देती है, जिससे पैदा होने वाले मैगॉट्स जिंदा मांस को खाना शुरू कर देते हैं। मेक्सिको के रास्ते अमेरिका के पास पहुंचने वाली इस मक्खी ने डॉक्टरों के साथ वैज्ञानिकों की भी चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका पर मडरा रहा यह खतरा किसी हॉरर फिल्म की कहानी जैसा लग रहा है। एक फिल्म में एक जानवर तबाही मचाता नजर आता है। अब वही कहानी अमेरिका में भी देखी जा सकती है। बता दें कि न्यू वर्ल्ड स्क्रूवर्म को जिंदा मांस खाने वाली मक्खी कहा जाता है। मेक्सिको के दो राज्यों- तमाउलिपास और नुएवो लियोन में इसके मामले सामने आए हैं। जिनकी सीमा टेक्सास से लगती है। यह मक्खी केवल जानवरों के लिए ही नहीं, बल्कि इंसानों के लिए भी जानलेवा साबित हो रही है।
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बता दें कि इससे पहले 1950 के दशक में भी इस मक्खी ने भारी तबाही मचाई थी। दशकों की मेहनत के बाद इसे खत्म कर दिया गया था। अब इसका दोबारा लौटकर आना न केवल पशुपालन उद्योग के लिए बड़ा आर्थिक झटका है, बल्कि एक गंभीर हेल्थ इमरजेंसी का भी संकेत है। ऐसा इसलिए है क्योंकि न्यू वर्ल्ड स्क्रूवर्म के काम करने का तरीका बेहद डरावना है। यह मक्खी गर्म खून वाले जीवों, जैसे मवेशी, कुत्ते और कभी-कभी इंसानों के शरीर पर मौजूद खुले घावों या प्राकृतिक छिद्रों में अपने अंडे देती है। एक बार में यह मादा मक्खी 200 से 300 अंडे तक दे सकती है। अंडों से निकलने वाले लार्वा या मैगॉट्स तुरंत जिंदा मांस को खाना शुरू कर देते हैं। वैज्ञानिका भाषा में इस स्थिति को मयाइसिस कहा जाता है। जैसे-जैसे ये लार्वा शरीर के अंदर मांस खाते हैं, गहरे और भयावह घाव बनते चले जाते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि अगर समय पर समुचित इलाज नहीं मिला तो इससे संक्रमित जीव की मौत बहुत जल्दी हो जाती है। इसके अलावा इस पर नियंत्रण करना भी आसान नहीं है। यह एक के बाद दूसरे जीव में फैलने लगती है। टेक्सास में 1935 के दौरान आए एक प्रकोप में करीब 2.30 लाख पशु और हजारों की संख्या में इंसान मारे गए थे।
वैज्ञानिकों के अनुसार इसको खत्म करने की प्रक्रिया बेहद जटिल है। इसे रोकने के लिए वैज्ञानिक स्टेरिल इंसेक्ट तकनीक का इस्तेमाल करते आए हैं। इस प्रोसेस में लैब के अंदर बड़ी संख्या में नर मक्खियों को पैदा किया जाता है। रेडिएशन के जरिए उन्हें बांझ बना दिया जाता है। जब इन बांझ नरों को खुले में छोड़ा जाता है, तो वे जंगली मादाओं के साथ मीटिंग करते हैं, चूंकि नर बांझ होते हैं, इसलिए मादा कोई संतान पैदा नहीं कर पाती। धीरे-धीरे उस प्रजाति की आबादी खत्म होने लगती है। 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में अमेरिका और मध्य अमेरिका से इस मक्खी को इसी तकनीक से भगाया गया था। चिंता की बात यह है कि अब यह सिस्टम भी फेल होता दिख रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि बांझ मक्खियों को तैयार करने वाली पुरानी लैब बंद हो चुकी है। नई लैब को शुरू होने में समय लगेगा। तब तक के लिए केवल कीटनाशकों का सहारा लेना ही एकमात्र रास्ता नजर आ रहा है। कीटनाशकों से इन्हें नियंत्रित नहीं किया जा सकता। वर्तमान स्थिति को देखते हुए वैज्ञानिक काफी डरे हुए हैं क्योंकि जब तक लैब शुरू होगी तब तक तो तबाही आ जाएगी।
इसका एक और पहलू यह भी है कि पुराने समय के वेटरनरी एंटोमोलॉजिस्ट यानी कीट विशेषज्ञ अब रिटायर हो चुके हैं। नए दौर में जेनेटिक और मॉलिक्यूलर रिसर्च पर तो जोर दिया जा रहा है, लेकिन फील्ड पर काम करने वाले एक्सपर्ट्स की कमी हो गई है। जब ये अनुभवी विशेषज्ञ रिटायर हुए, तो उनके साथ वह प्रैक्टिकल नॉलेज भी चला गया जो इन कीड़ों को कंट्रोल करने के लिए जरूरी था। अब नए सिरे से तैयारी करने में समय लगेगा।





