जनप्रवाद ब्यूरो, टीम। पूरी दुनिया में युद्ध का तरीका बदल रहा है। वैज्ञानिक नित नए प्रयोग कर नई तकनीक विकसित कर रहे हैं। इसी क्रम में जर्मनी और साउथ कोरिया ने ऐसी तकनीक विकसित की है जो हैरान करने वाली है। जर्मनी ने जो रोबोट तकनीक विकसित की वह जासूसी के तरीके को बदल देगी। वहीं साउथ कोरिया की तकनीक से वह काम आसान हो जाएगा जो इंसान कभी नहीं कर पाएगा।
जर्मनी की कंपनी ने बनाया रोबोट
जर्मनी की एक कंपनी ने ऐसे रोबोट का विकास किया है जो किसी साइंस फिक्शन फिल्म की तरह है। यहां के वैज्ञानिकों ने कॉकरोच रोबोट की कल्पना पेश कर पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों को चौंका दिया है। यह रोबोट जासूसी और सैन्य मिशनों में इस्तेमाल किया जाएगा। इन्हें कॉकरोच साइबॉर्ग भी कहा जा रहा है। इन बैकपैक में सेंसर, कैमरा और कम्युनिकेशन सिस्टम लगे हैं। जिनकी मदद से यह कीड़े दुश्मन के इलाके में जाकर जानकारी जुटा सकते हैं। यह तकनीक खासतौर पर उन जगहों के लिए बनाई जा रही है जहां इंसान, ड्रोन या पारंपरिक रोबोट पहुंच नहीं पाते हैं। उदहारण के लिए ढही हुई इमारतें, संकरी सुरंगें या युद्ध इन जगहों पर ये छोटे-छोटे रोबोट आसानी से घुसकर जानकारी इकट्ठा कर सकते हैं।
बैकपैक में लगे हैं कई तरह के उपकरण
अगर इसके काम करने के तरीकों पर नजर डालें तो इन कॉकरोच के ऊपर जो माइक्रो बैकपैक लगाया जाता है उसमें कई तरह के उपकरण लगे हैं। यह सिस्टम रियल-टाइम डेटा भेज सकता है। इसके अलावा आसपास के माहौल की जानकारी भी जुटा सकता है। इतना ही नहीं, वैज्ञानिक इन कीड़ों की मूवमेंट को भी नियंत्रित कर सकते हैं। इसके लिए हल्के इलेक्ट्रिकल सिग्नल भेजे जाते हैं। इसकी मदद से आॅपरेटर दूर बैठकर भी दिशा नियंत्रित कर सकते हैं।
साउथ कोरिया ने बनाया रोबोट
दूसरे रोबोट की बात करें तो इसे साउथ कोरिया ने बनाया है। यह एक ऐसा छह पहियों वाला आॅटोनॉमस रोबोट है, जो भीषण आग के बीच बेखौफ होकर घुस सकता है। यह रोबोट उन खतरनाक जगहों पर सबसे पहले पहुंचेगा जहां इंसान के जाने का मतलब सीधा मौत से मुकाबला करना है। इसका डिजाइन किसी मिलिट्री टैंक की तरह है। इसका मकसद गोले चलाना नहीं बल्कि लोगों की जान बचाना है। इसमें एक विशाल नोजल लगा है जो पानी की भारी बौछार के साथ-साथ अंधेरे में रास्ता दिखाने के लिए तेज रोशनी भी फेंकता है।
खुद को ठंडा रखने वाला सिस्टम
इस रोबोट की सबसे बड़ी खासियत इसका खुद को ठंडा रखने वाला सिस्टम है। जब यह 1,000 डिग्री से भी ज्यादा तापमान वाले इलाके में काम करता है, तो इसका सेल्फ-स्प्रेइंग सिस्टम लगातार पानी की बौछार करता रहता है। इसकी वजह से रोबोट का बाहरी तापमान 50 से 60 डिग्री सेल्सियस के बीच ही बना रहता है। यह टेक्नोलॉजी इसे पिघलने या खराब होने से बचाती है। साउथ कोरिया की नेशनल फायर एजेंसी के मुताबिक, पिछले एक दशक में लगभग 1,788 फायरफाइटर्स ड्यूटी के दौरान शहीद हुए या घायल हुए हैं। ऐसे में यह रोबोट फायरफाइटर्स के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम करेगा।
बेहद एडवांस थर्मल इमेजिंग सेंसर्स
बता दें कि आग लगने पर सबसे बड़ी चुनौती घना धुआं होता है। इसमें इंसानी आंखें नाकाम हो जाती हैं। हुंडई के इस रोबोट में बेहद एडवांस थर्मल इमेजिंग सेंसर्स लगे हैं। यह सेंसर्स धुएं के पार देख सकते हैं और मलबे में दबे या फंसे हुए लोगों की लोकेशन का सटीक पता लगा सकते हैं। यह रोबोट आग बुझाने के साथ-साथ सुरक्षित रास्तों का मैप भी तैयार करता है, ताकि बाद में आने वाले फायरफाइटर्स को पता हो कि कहां जाना सुरक्षित है और कहां नहीं। इस रोबोट का स्ट्रक्चर बहुत ही मजबूत है। इसके छह पहियों में इंडिपेंडेंट मोटर्स लगी हैं, जो वाटरप्रूफ इलेक्ट्रिकल मॉड्यूल्स से लैस हैं। इसका मतलब है कि पानी के बीच काम करते समय इसमें कोई शॉर्ट सर्किट नहीं होगा।





