जन प्रवाद, ब्यूरो।
नई दिल्ली। देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट किया है कि आधार कार्ड के गलत इस्तेमाल या धोखाधड़ी से जारी होने के आरोपों की जांच अदालत के दायरे में नहीं आती। ऐसे मामलों को केंद्र सरकार को देखना चाहिए। यह टिप्पणी पश्चिम बंगाल में चल रहे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की गई।

रोहिंग्या शरणार्थियों पर आरोप
सुनवाई में आरोप लगाया गया कि पश्चिम बंगाल में रोहिंग्या शरणार्थियों को कथित रूप से फर्जी आधार कार्ड जारी किए जा रहे हैं। अदालत ने कहा कि यह एक गंभीर मुद्दा हो सकता है, लेकिन इसके लिए विस्तृत जांच और नीतिगत निर्णय की आवश्यकता है, जो केवल सरकार के स्तर पर ही संभव है।
भाजपा नेता का पक्ष
भाजपा नेता और एडवोकेट अभिजीत उपाध्याय ने इस मामले में कोर्ट से और स्पष्टीकरण की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि रोहिंग्याओं को धोखाधड़ी से आधार कार्ड दिए जा रहे हैं। इस पर जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि उपाध्याय भारत सरकार को रिप्रजेंटेशन दे सकते हैं और यदि आवश्यक हो तो कानून में बदलाव की मांग कर सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण
जस्टिस बागची ने आगे कहा कि आधार को पहचान के सबूत के तौर पर स्वीकार करना होगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि आधार नागरिकता साबित करने का दस्तावेज नहीं है। यदि आधार को बड़े पैमाने पर धोखे से हासिल किया जाता है, तो इसे कानूनी रूप से रेगुलेट किया जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी यही रुख अपनाते हुए कहा कि इस तरह के आरोपों की गहराई से जांच की जरूरत है, लेकिन अदालत इसके लिए उपयुक्त मंच नहीं है। अदालत का यह रुख संकेत देता है कि आधार कार्ड के दुरुपयोग जैसे संवेदनशील मामलों में नीति निर्माण और कार्रवाई का दायित्व कार्यपालिका पर ही है।
सितंबर 2025 का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2025 में इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया (ECI) को निर्देश दिया था कि बिहार की संशोधित मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने के लिए आधार कार्ड को पहचान के सबूत के तौर पर स्वीकार किया जाए। कोर्ट ने कहा था कि रिप्रजेंटेशन ऑफ पीपल एक्ट, 1950 के सेक्शन 23(4) के तहत आधार उन दस्तावेजों में से एक है जो पहचान साबित कर सकते हैं। हालांकि, आयोग को आधार की असलियत की जांच करने और अतिरिक्त दस्तावेज मांगने का अधिकार होगा।





