जापान करने जा रहा बड़ा कारनामा, अब सीधे अंतरिक्ष से आएगी बिजली

जनप्रवाद ब्यूरो। बिजली बनाने के परंपरागत तरीके कोल पावर प्लांट और हाइड्रो इलेक्ट्रिसिटी पावर प्लांट सब इतिहास बन जाएंगे। अब स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में जापान ऐतिहासिक कदम उठाने की तैयारी कर रहा है। इस प्लान के अनुसार धरती पर सीधे अंतरिक्ष से बिजली आएगी। यह क्रांतिकारी कदम दुनिया की ऊर्जा जरूरतों की तस्वीर बदल देगा।

बिजली लोगों की मूलभूत आवश्यकता


रोटी, कपड़ा और मकान की तरह ही बिजली भी लोगों की मूलभूत आवश्यकता बन चुकी है। घर रोशन करने से लेकर ट्रेन चलाने तक हर जगह बिजली की जरूरत होती है। विद्युत ऊर्जा का निर्माण करने के लिए कोल पावर प्लांट बिजली उत्पादन का परंपरागत तरीका है। इसमें कोयले की मदद से पानी गर्म किया जाता है। इससे बनी भाप के उच्च दाब से टरबाइन तेजी से घूमता है और बिजली का उत्पादन होता है। इसी तरह हाइड्रो इलेक्ट्रिसिटी पावर प्लांट ऐसी जगहों पर बनाए जाते हैं जहां तेजी से पानी का प्रवाह होता है। सबसे पहले बांध बना कर नदी के पानी को रोका जाता है। यह पानी तेजी से नीचे गिरता है। इसकी मदद से टरबाइन को घुमाया जाता है और बिजली उत्पादन होता है। परंपरागत तरीकों में पवन चक्की का भी इस्तेमाल किया जाता है। इनका प्रयोग इन क्षेत्रों में किया जाता है, जहां हवा की गति तेज होती है। पवन चक्की लगाने के लिए एक टॉवर के ऊपर पंखे लगाए जाता हैं। यह पंखा हवा की वजह से घूमता है। पंखे के साथ शाफ्ट की मदद से एक जेनेरेटर जुड़ा होता है। जेनरेटर के घूमने से बिजली का उत्पादन होता है।

स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कदम

अब जापान इन तरीकों से आगे निकलने वाला है। जापान स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में एक ऐतिहासिक कदम उठाने की तैयारी कर रहा है। नए प्लान के अनुसार 2026 में ओहिसामा नामक एक डेमोंस्ट्रेशन सैटेलाइट लांच किया जाएगा। इसका मकसद अंतरिक्ष में पैदा की गई सौर ऊर्जा को सीधे धरती पर भेजना और उसे उपयोगी बिजली में बदलना है। अगर यह मिशन सफल रहता है तो यह दुनिया में अपनी तरह की पहली उपलब्धि होगी। स्पेस-बेस्ड सोलर पॉवर यानी एसबीएसपी का मतलब है पृथ्वी की कक्षा में बड़े सोलर पैनल स्थापित करना जो सूरज की रोशनी को बिजली में बदल सके। इसके बाद इस ऊर्जा को माइक्रोवेव या लेजर तकनीक के जरिए वायरलेस तरीके से पृथ्वी पर भेजा जाएगा। जमीन पर मौजूद रिसीविंग स्टेशन इस ऊर्जा को फिर से बिजली में बदलकर ग्रिड में सप्लाई करेगा। यह प्रणाली धरती पर लगे सोलर पैनलों से अलग होगी। यह प्रणाली बादल, बारिश या दिन-रात के चक्र से ज्यादा प्रभावित नहीं होगी। यही वजह है कि इसे भविष्य की स्थिर और भरोसेमंद ऊर्जा तकनीक माना जा रहा है।
करीब 180 किलोग्राम वजनी सैटेलाइट


करीब 180 किलोग्राम वजनी यह सैटेलाइट 450 किलोमीटर ऊंचाई वाली कक्षा से माइक्रोवेव के रूप में ऊर्जा भेजेगा। इस ऊर्जा को नागानो प्रांत स्थित उसुडा डीप स्पेस सेंटर में मौजूद बड़ी एंटीना के जरिए प्राप्त किया जाएगा। यह सैटेलाइट छोटे रॉकेट काइरोस 5 से प्रक्षेपित किया जाएगा। बता दें कि परीक्षण के दौरान रॉकेट के पिछले प्रयासों में चुनौतियां आई थीं। अब पूरे मिशन को सफल बनाने के लिए अधिक प्रयोग किए गए हैं। जापान स्पेस सिस्टम्स द्वारा प्रस्तावित मॉडल के अनुसार, भविष्य में 36,000 किलोमीटर ऊंचाई पर विशाल सोलर तैनात किए जाएंगे। माइक्रोवेव के जरिए ऊर्जा को करीब 4 किलोमीटर चौड़ी ग्राउंड एंटीना तक भेजा जाएगा। अनुमान है कि ऐसी एक इकाई लगभग 1 गीगावॉट बिजली पैदा कर सकती है। यह टोक्यो की सालाना बिजली जरूरत का 10 प्रतिशत से अधिक हिस्सा पूरा कर करेगी।  अमेरिका, चीन और यूरोप भी इस दिशा में शोध कर रहे हैं लेकिन जापान 1980 के दशक से इस तकनीक पर काम कर रहा है। माइक्रोवेव ट्रांसमिशन और सटीक बीम कंट्रोल ने जापान को अन्य देशों से आगे कर दिया है। यदि यह प्रयोग सफल रहा तो 2040 के दशक तक इसके व्यावसायिक उपयोग की राह खुल सकती है। भविष्य में चंद्र मिशनों को ऊर्जा उपलब्ध कराने में भी यह तकनीक अहम भूमिका निभाएगी।