जनप्रवाद ब्यूरो, टीम। एक शोध ने वैज्ञानिकों को चौंका दिया है। शोध के अनुसार आसमान से तारे गायब हो रहे हैं या पूरी संख्या में अब वो दिखाई नहीं दे रहे हैं। यह परेशान करने वाली बात जरूर है, लेकिन इसके पीछे किसी खगोलीय घटना नहीं बल्कि इंसानों के क्रियाकलाप जिम्मेदार हैं।
चमकीली दुनिया का नजारा
भारत के छोटे शहरों या गांवों में जब बिजली कट जाती थी तो लोग छत पर जाकर आसमान में चमकते तारों को गिना करते थे? लोगों को अंधेरे के समय एक अलग ही चमकीली दुनिया का नजारा दिखता था। आज पूरी दुनिया के कई शहरों में हालत बदल गए हैं। हम यह भी कह सकते हैं कि भारत के भी कई शहर अपनी स्वर्णिम खगोलीय विरासत खो रहे हैं। एक ताजा शोध के अनुसार हमारे आसमान में तारे तेजी से कम दिखाई देने लगे हैं। दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में स्थिति बदतर होती जा रही है। यहां अब बिल्कुल अंधेरा हो जाने पर भी तारे बहुत ही कम नजर आते हैं। हालात अगर ऐसे ही रहे तो आने वाली पीढ़ी के बच्चे केवल किताबों के पन्नों और तस्वीरों में ही सितारे और मिल्की-वे जैसी दिलचस्प चीजों के बारे में पढ़ा करेंगे। शोधकर्ताओं के अनुसार आसमान से सितारों का यह पलायन केवल एक दृश्य बदलाव नहीं है, बल्कि एक गंभीर पर्यावरणीय संकट है। यह हमारी आने वाली पीढ़ी से ब्रह्मांड की भव्यता छीन रहा है।
आसमान से गायब हो रहे हैं तारे
इन बातोें को जानकर अगर आपको लग रहा है कि तारे आसमान से गायब हो रहे हैं तो आप जान लीजिए कि ऐसा बिल्कुल नहीं है। तारे आज भी वहीं हैं जहां सैकड़ों साल पहले थे। ये सब प्रकाश प्रदूषण यानी लाइट पॉल्यूशन की वजह से हो रहा है। इसकी वजह से हमें रात के समय आसमान में कम संख्या में तारे दिखाई दे रहे हैं। मुंबई के टीआईएफआर-एचबीसीएसई के विशेषज्ञों ने भी इस बारे में गंभीर चिंता व्यक्त की है। उनके अनुसार 90 के दशक तक शहरों के बाहरी इलाकों से भी आकाशगंगा एक सफेद रोशनी की नदी की तरह साफ दिखाई देती थी। आज वह स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। रोशनी के प्रदूषण और इसके बेतहाशा इस्तेमाल ने अनोखे प्राकृतिक नजारों को हमसे छीन लिया है। बता दें कि आसमान कितना अंधेरा या चमकदार है, इसे मापने के लिए वैज्ञानिक बोर्टल स्केल का इस्तेमाल करते हैं। इस पैमाने पर 1 से 9 तक के अंक होते हैं। जहां का स्कोर 1 होता है वहां गहरे और शुद्ध अंधेरे में तारे साफ दिखाई देते हैं। उदाहरण के लिए लद्दाख के हैनले में यह दृश्य साफ देखने को मिलता है। वहां से लाखों प्रकाश वर्ष दूर की गैलेक्सी भी नग्न आंखों से देखी जा सकती हैं। इसके विपरीत, दिल्ली का स्कोर 9 है। यहां रात के समय आसमान पूरी तरह बेजान और नारंगी दिखता है। मुंबई का स्कोर 8 है, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है।
स्ट्रीट लाइटों की गलत डिजाइन जिम्मेदार
शोधकर्ताओं अनुसार आसमान के इस प्रदूषण का एक बड़ा कारण हमारे शहरों की स्ट्रीट लाइटों की गलत डिजाइन है। विशेषज्ञों का कहना है कि अधिकांश लाइटें इस तरह लगाई गई हैं कि उनकी रोशनी सीधे ऊपर आसमान की ओर जाती है। यह रोशनी वातावरण के कणों से टकराकर एक नारंगी धुंध पैदा कर रही हैं। वैज्ञानिक भाषा में इसे स्काईग्लो कहा जाता है। इस धुंध के कारण तारों की मंद रोशनी हम तक नहीं पहुंच पाती है और हमें आसमान बिल्कुल खाली नजर आता है।
खगोल विज्ञान हो रहा प्रभावित
शोधकर्ताओं के अनुसार सितारों के गायब होने से न केवल खगोल विज्ञान प्रभावित हो रहा है, बल्कि यह पारिस्थितिकी तंत्र को भी नुकसान पहुंचा रहा है। रात में सक्रिय रहने वाले जीव-जंतु और प्रवासी पक्षी इस कृत्रिम रोशनी से भ्रमित हो रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इस समस्या का समाधान बहुत सरल है। अगर स्ट्रीट लाइटों पर एक शेड लगा दिया जाए और उनका रुख ऊपर के बजाय सीधे जमीन की ओर हो जाएगा। तो हम काफी हद तक अपने आसमान को बचा सकते हैं और बिजली की बर्बादी भी रोक सकते हैं।





