जनप्रवाद ब्यूरो, टीम। वैज्ञानिकों ने ऐसी खोज की है जिसे सुनकर हर कोई हिल जाएगा। हो भी क्यों नहीं ? यह कोई आम खोज नहीं है। अगर इस मिशन को पूरा कर लिया गया तो पूरी दुनिया की गरीबी दूर हो जाएगी। हर कोई मालामाल हो जाएगा। इसे देखकर वैज्ञानिकों की भी आंखें चौंधिया गई हैं।
ब्रह्मांड के भीतर अनगिनत रहस्य
हमारा ब्रह्मांड न केवल अपने भीतर अनगिनत रहस्य छिपाए हुए है बल्कि कई खजानों को भी अपने भीतर समाहित किए हुए है। धरती के लिए भले ही ये खतरनाक माने जाते हैं लेकिन ऐसा माना जाता है कि गैलक्सी में घूमने वाले इन एस्टेरॉयड के टकराने से ही धरती के भीतर कई अमूल्य धातुओं का निर्माण हुआ था। हमारे ब्रह्मांड में घूमने वाले इन एस्टेरॉयड में माइनिंग का विचार लंबे समय से वैज्ञानिकों और टेक कंपनियों को आकर्षित करता रहा है। सैद्धांतिक रूप में भी देखा जाए तो एस्टेरॉयड भविष्य में पृथ्वी और अंतरिक्ष उद्योगों के लिए विशाल संसाधन बन सकते हैं। अब वैज्ञानिकों ने मंगल और बृहस्पति ग्रह के बीच एक विशाल मेटेलिक चट्टान खोज निकाला है। इसे सोने का पहाड़ बताया जा रहा है। खोजकर्ताओं ने इसका नाम है 16 मानस रखा है। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के वैज्ञानिकों ने इसे खजाने का पहाड़ कहा है।
एस्टेरॉयड में भारी मात्रा में सोना
नासा के वैज्ञानिकों के अनुसार इस एस्टेरॉयड में भारी मात्रा में सोना, प्लैटिनम, निकल और लोहे जैसे मैटल मौजूद हैं। कई मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि इसमें पृथ्वी से कई गुना ज्यादा सोना हो सकता है। अगर इसकी माइनिंग की जाए तो सालों तक यह काम चलता रहेगा। इस खजाने की अनुमानित कीमत क्वाड्रिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है। भारतीय करेंसी में क्वाड्रिलियन डॉलर का मतलब करीब 1000 लाख करोड़ होता है। यानी यह इतनी बड़ी रकम है जिसकी तुलना कई देशों की पूरी अर्थव्यवस्था समाहित हो जाएगी। इसी वजह से इसे ट्रिलियन डॉलर एस्टेरॉयड कहा जा रहा है। अर्थ डॉट काम की रिपोर्ट के अनुसार इस एस्टेरॉयड की खोज इटली के खगोलशास्त्री अन्नीबाले दे गैस्पारिस ने की थी। करीब 220 किलोमीटर चौड़ा यह एस्टेरॉयड सामान्य पत्थरीले उल्कापिंडों से बिल्कुल अलग माना जाता है। वहीं नासा की रिपोर्ट की मानें तो इस एस्टेरॉयड की सबसे बड़ी अहमियत इसकी संपत्ति के साथ-साथ इसका वैज्ञानिक महत्व है। रिसर्चर्स का मानना है कि 16 मानस किसी प्राचीन ग्रह का खुला हुआ कोर हो सकता है। माना जाता है कि अरबों साल पहले शुरुआती सौरमंडल में हुए भीषण टक्करों के कारण उस ग्रह की बाहरी परतें टूट गईं थी। इसके बाद सिर्फ मेटल वाला अंदरूनी हिस्सा बच गया था।
नासा ने की बड़ी पहल

बता दें कि नासा ने इस रहस्यमयी एस्टेरॉयड की जांच के लिए साल 2023 में एक मिशन भी लांच किया था। यह स्पेसक्राफ्ट स्पेशएक्स के फॉल्कन हैवी
रॉकेट से भेजा गया था। यह स्पेसक्राफ्ट 2029 तक इस एस्टेरॉयड तक पहुंचेगा। उसके बाद इसकी असली तस्वीर सामने आएगी। ऐसे में वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि यह मिशन ग्रहों के निर्माण और सौरमंडल के शुरुआती इतिहास से जुड़े कई रहस्यों से पर्दा उठाएगा। इस मिशन का मकसद एस्टेरॉयड की संरचना, गुरुत्वाकर्षण, चुंबकीय क्षेत्र और सतह की बनावट का वास्तविक अध्ययन करना है। इस बारे में शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसे एस्टेरॉयड भविष्य में पृथ्वी और अंतरिक्ष उद्योगों के लिए विशाल संसाधन बन सकते हैं। फिलहाल, यहां खनन करना काफी चुनौतीपूर्ण कार्य है। ऐसे में वैज्ञानिकों को ऐसी तकनीक विकसित करनी होगी जिससे इतनी दूर जाकर खनन किया जा सके। साथ ही इन संसाधनों को धरती पर लाया जा सके। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह बेहद मुश्किल काम है लेकिन अगर ऐसे ही शोध कार्य जारी रहे तो तो यह जटिल और महंगा काम आसान हो जाएगा।





