जनप्रवाद ब्यूरो, नई दिल्ली। जापान ने प्रशांत महासागर में हजारों मीटर की गहराई में ऐसा कारनामा कर दिखाया जिससे दुनिया में चीन की दादागिरी खत्म हो जाएगी। यह मिशन रेयर अर्थ से संबंधित है। यह मिशन लगभग असंभव सा माना जा रहा था। इसकी सफलता अन्य देशों के लिए प्रेरणा बनेगी।
समुद्र के भीतर खोज कर रहे हैं वैज्ञानिक
अंतरिक्ष के साथ ही दुनियाभर के देश समुद्र के भीतर खोज कर रहे हैं। भारत भी अंतरिक्ष में सफलता के बाद समुद्र के रहस्यों को खंगालने में पीछे नहीं रहना चाहता। समुद्र के अज्ञात रहस्यों से परदा उठाने के लिए वह अपने समुद्रयान मिशन की तैयारी में है। समुद्र से जुड़ा भारत का यह अपनी तरह का पहला मिशन है। अपने इस मिशन के तहत भारत तीन प्रशिक्षित गोताखोरों को समुद्र में 6000 मीटर की गहराई पर भेजेगा। इस मिशन के तहत इसका मुख्य उद्देश्य गहरे समुद्र में पाए जाने वाले संसाधनों जैसे पॉलीमेटैलिक नॉड्यूल्स, गैस हाइड्रेट्स और कोबाल्ट-समृद्ध परतों की संभावनाओं की जांच करना है। यह महत्वाकांक्षी परियोजना भारत को उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल कर देगी जिनके पास गहरे समुद्र की खोज करने की क्षमता है।
रेयर अर्थ एलीमेंट्स
जापानी वैज्ञानिकों ने प्रशांत महासागर की 6000 मीटर की गहराई में उतरकर बड़ी खोज की है। वैज्ञानिकों ने समुद्र के गहरे तल से रेयर अर्थ एलीमेंट्स को निकालने में सफलता पाई है। प्रशांत महासागर की तलहटी में समुद्री ड्रिलिंग जहाज की मदद से इतनी गहराई से नमूने निकालने का यह पहला प्रयास है। यह खोज टोक्यो से 2000 किमी दक्षिण-पूर्व में स्थित मिनामिटोरिशिमा में की गई है, जो एक छोटा सा मूंगा द्वीप है। जापान ने इस मिशन के नतीजे को आर्थिक सुरक्षा और समुद्री विकास के लिहाज से मील का पत्थर बताया। जापान की इस सफलता का महत्व तकनीक से ज्यादा रणनीतिक है।
आधुनिक तकनीकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण
बता दें कि रेयर अर्थ उन धातुओं के समूह को कहा जाता है, जो आधुनिक तकनीकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। इनका उपयोग इलेक्ट्रिक वाहन, पवन टर्बाइन, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, सेमी कंडंक्टर के साथ ही रक्षा क्षेत्र के लिए महत्वपूर्ण रडार प्रणालियों, मिसाइलों और दूसरी चीजों में किया जाता है। वैज्ञानिकों ने अनुमान जताया है कि पानी के नीचे मौजूद भंडार में 160 लाख टन से भी ज्यादा रेयर अर्थ मिनरल्स हो सकते हैं। यह दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा भंडार माना जा रहा है। मिनामिडोरिशिमा द्वीप के पास मौजूद डाइस्प्रोसियम और यट्रियम जैसे तत्व 700 से 800 साल तक की खपत के लिए पर्याप्त हैं।
चीन की दादागिरी होगी खत्म
रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि जापान की यह खोज रेयर अर्थ में चीन की दादागिरी को खत्म कर सकती है। साथ ही अन्य देशों के लिए भी प्रेरणा बन सकती है। इससे भारत जैसे देश भी आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम उठा सकते हैं। बता दें कि जापान के इस मिशन की कहानी 2010 में शुरू हुई थी। जब चीन के साथ एक कूटनीतिक संकट ने जापान को मुश्किल में डाल दिया। सेनकाकू द्वीपों के पास एक चीनी मछली पकड़ने वाली नाव और जापान के दो कोस्ट गार्ड जहाजों के बीच हुई एक घटना के बाद चीन ने लगभग दो महीनों के लिए जापान को रेयर अर्थ का निर्यात रोक दिया था। उस समय टोक्यो इन खनिजों का 90 फीसदी चीन से आयात करता था। इस रोक से आॅटोमेटिव क्षेत्र में घबराहट फैल गई। एक साल के भीतर ही रेयर अर्थ की वैश्विक कीमतें दस गुना बढ़ गईं। इस घटना को टोक्यो ने बड़े खतरे के रूप में देखा और अपनी रणनीति में बदलाव शुरू कर दिया। जापान सरकार ने एक असाधारण योजना पर काम किया। हाल के महीनों में चीन और जापान के बीच तनाव एक बार फिर बढ़ गया है। जापानी प्रधानमंत्री साने ताकाइची के ताइवान को लेकर दिए गए बयानों पर चीन ने तीखी प्रतिक्रिया दी। इसके साथ ही चीन ने रेयर अर्थ चुंबक और दोहरे उपयोग वाली सामग्रियों के निर्यात को धीमा करना या सीमित करना शुरू कर दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन उपायों का असर पहले ही आॅटोमोटिव, सेमीकंडक्टर और रक्षा क्षेत्रों में सक्रिय जापानी कंपनियों पर पड़ना शुरू हो गया है। इसे देखते हुए मिनामिटोरिशिमा का महत्व और भी बढ़ गया। इस नई खोज के बाद जापान चीन से पूरी तरह दूरी बना लेगा।





