जनप्रवाद ब्यूरो, टीम। आपने अक्सर नशे में टल्ली होकर शराबियों को लड़खड़ाते और गलत व्यवहार करते देखा होगा। अब यही काम मछलियां करने लगी हैं। यह बात सुनने में अजीब लग रही है लेकिन यह सच है कि यह जलीय जीव नशे में टल्ली होकर रास्ता भटक रहा है। इससे न केवल पर्यावरणीय को खतरा है बल्कि इसका सीधा असर इंसानों पर पड़ना तय है।
समुदी जीवों पर हुआ नया अध्ययन
समुदी जीवों पर हुए एक नए अध्ययन ने दुनिया भर के वैज्ञानिकों की चिंताएं बढ़ा दी है। नए शोध के अनुसार दुनिया भर की नदियों और झीलों में बढ़ता प्रदूषण अब जलीय जीवों के लिए बड़ी मुसीबत बन गया है। इसके बारे में आज तक किसी को पता नहीं था। जब समुद्र से लेकर नदियों तक की मछलियां अजीब व्यवहा करने लगी तो इस शोध किया गया। इसमें पाया गया कि इंसानों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे नशीले पदार्थों के अवशेष अब पानी के रास्ते बेजुबान मछलियों के शरीर तक पहुंच रहे हैं। शोध के अनुसार दुनिया भर की नदियों और झीलों से होता हुअए नशीला पदार्थो के केमिकल समुद्र तक पहुंच रहे हैं। कोकीन और उसका केमिकल पानी में मिल रहा है। इसका कभी दुष्प्रभाव हो रहा है। वैज्ञानिकों से इसे आसान भाषा में समझाया है। उनके अनुसार जैसे घर में उठा धुआं बच्चों को नुकसान पहुंचाता है, वैसे ही प्रदूषित पानी में रहने वाली छोटी-छोटी जीव, मछलियां और यहां तक कि शार्क भी केमिकल को शरीर में सोख रही हैं।
अटलांटिक सैल्मन मछलियों पर प्रयोग
बता दें स्वीडन की टीम ने अटलांटिक सैल्मन मछलियों पर प्रयोग पहली बार अध्ययन किया। इसका नतीजा बेहद चौंकाने वाला था। वैज्ञानिकों ने अपनी रिसर्च में पाया है कि कोकीन और उसके केमिकल पानी में मिलकर मछलियों के व्यवहार को पूरी तरह बदल रही हैं। प्रदूषित पानी में रहने वाली मछलियां और शार्क इन रसायनों के प्रभाव में आते ही नशेड़ी जैसा व्यवहार कर रही हैं। ये मछलियां ज्यादा दूर-दूर तक भटकने लगीं है। यह अध्ययन करंट बायोलॉजी मैगजीन में छपा है। यह प्रक्रिया बेहद खतरनाक पाई गई। वैज्ञानिकों के अनुसार नशे का असर तो इंसान पर कुछ घंटों में चला जाता है। वहीं कोकीन और उसका केमिकल लंबे समय तक पानी में रह जाता है। दुनिया भर की नदियां और झीलें इससे भरी मिली हैं। लैब के प्रयोगों में देखा गया कि कोकीन मिलने पर पानी के छोटे कीड़े भी तेजी से तैरने लगते हैं।
105 मछलियों को तीन ग्रुप में बांटा गया
अध्ययनकर्ताओं ने शोध से पहले 105 मछलियों को कुल तीन ग्रुप में बांटा। एक को कोकीन, दूसरे को बेंजॉइलेकोगोनिन और तीसरे को बिना किसी केमिकल वाला कंट्रोल्ड ग्रुप समझा। सभी मछलियों पर छोटे ट्रैकिंग टैग लगाए गए। इन्हें स्वीडन की वेटर्न झील में छोड़ दिया गया और दो महीने तक उनकी हरकतों पर नजर रखी गई। इसमें पाया गया कि सामान्य मछलियां पहले ज्यादा घूमती दिखी। इसे बाद धीरे-धीरे एक जगह बस गई। वही कोकीन और उसके बचे हुए केमिकल वाली मछलियां लंबे समय तक भटकती रहीं। बेंजॉइलेकोगोनिन वाली मछलियां हर हफ्ते अन्य की तुलना में 1.9 गुना ज्यादा दूरी तय करती देखी गर्इं। वैज्ञानिकों ने पाया कि कोकीन का मुख्य टूटा हुआ केमिकल यानी बेंजॉइलेकोगोनिन ज्यादा समय तक मछली के शरीर में रहता है। ऐसे में इसका असर भी ज्यादा पाया गया।
जीव-जंतुओं का बदल रहा व्यवहार
इस अध्ययन से साफ हो जाता है कि प्रदूषित पानी में रहने वाले सारे जीव-जंतुओं का व्यवहार बदल सकता है। अब सरकारों और वैज्ञानिकों को मिलकर जल प्रदूषण पर सख्त कदम उठाने चाहिए। इससे प्रकृति का संतुलन बिगड़ने से बचाया जा सके। मछलियों का बदलता व्यवहार आने वाले समय में इंसानों के लिए घातक साबित होगा। इससे शार्कजैसी अन्य बड़ी मछलियां आक्रामक हो सकती हैं। यह शोध बताता है कि कोकीन जैसे नशीले पदार्थों की समस्या महज इंसानों की सीमित नहीं है। यह पूरी प्रकृति की समस्या बन चुका है।





