जनप्रवाद ब्यूरो, टीम। डीआरडीओ ने ऐसी तकनीक विकसित करने में कामयाबी हासिल की है जिससे हमारे टैंक अजेय हो जाएंगे। दुश्मन जमीन के भीतर कितनी भी माइंस बिछा दे हर खतरे को यह तकनीक नष्ट कर देगी। सबसे बड़ी बात यह है कि इससे न केवल युद्ध के समय सेना का काम आसाना होगा बल्कि आतंकवादियों के खिलाफ भी आपरेशन चलाना आसान हो जाएगा।
सेना को मजबत करने की दिशा में बड़ा कदम
केंद्र सरकार ने सेना को मजबत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। नई दिल्ली में रक्षा सचिव राजेश कुमार सिंह की उपस्थिति में जरूरी अनुबंधों पर हस्ताक्षर किए गए। इससे भारतीय सेना के मुख्य युद्धक टैंकों टी-72 और टी-90 के लिए स्वदेशी ट्रॉल सिस्टम मिलने का रास्ता साफ हो गया। इस पूरे प्रोजेक्ट की कीमत लगभग 975 करोड़ रुपये आंकी गई है। यह डील बीईएमएल और एक निजी क्षेत्र की कंपनी के साथ मिलकर पूरी की गई है। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन द्वारा विकसित स्वदेशी टॉल सिस्टम इंडियन आर्मी की माइनफील्ड ब्रीचिंग यानी बारूदी सुरंगों को तोड़ने की क्षमता में क्रांतिकारी बदलाव लाएगा। इस तकनीक के जरिए सेना उन बारूदी सुरंगों के बीच से भी वाहनों के लिए सुरक्षित रास्ता यानी व्हीकल सेफ लेन बना सकेगी, जिनमें चुंबकीय फ्यूज लगे होते हैं। रक्षा जानकारों ने इस बड़ी उपलब्धि बताते हुए कहा कि अब भारतीय टैंक अजेय हो जाएंगे। इसे कदम सीधे तौर पर भारतीय सेना की जंग लड़ने की प्रभावशीलता को बढ़ाने और सीमाओं पर आपरेशन को बेहतर बनाने के मकसद से उठाया गया है।
मेक इन इंडिया के तहत विकास
रक्षा मंत्रालय के अनुसार यह पूरा प्रोजेक्ट मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत तैयार किया गया है। मंत्रालय के अधिकारियों के अनुसार इसे डीआरडीओ के वैज्ञानिकों ने तैयार किया है। इस डील के जरिए सरकार ने साफ संदेश दिया है कि अब भारत रक्षा तकनीक मामलों में दूसरे देशों पर निर्भर नहीं रहेगा। इस नई तकनीक के आने से न केवल सेना की मारक क्षमता बढ़ेगी, बल्कि स्वदेशी एमएसएमई सेक्टर को भी भारी मुनाफा होगा। ट्रॉल सिस्टम के काम करने के तरीके के बारे में बात करें तो यह एक तरह का भारी लोहे का ढांचा होता है। इसे टैंक के अगले हिस्से में फिट किया जाता है। जब टैंक दुश्मन के इलाके में आगे बढ़ता है, तो यह सिस्टम जमीन के अंदर दबी बारूदी सुरंगों को ब्लास्ट करके या उन्हें उखाड़कर रास्ता साफ करता है। आम तौर पर युद्ध के दौरान दुश्मन सेना टैंकों को रोकने के लिए जमीन में माइंस बिछा देती है। यह सिस्टम उन्हीं माइंस को पहचान कर उन्हें नष्ट कर देता है। इससे पीछे आ रहे टैंकों और सैनिकों के लिए एक सुरक्षित गलियारा तैयार हो जाता है।
टी-72 और टी-90 भीष्म जैसे टैंक
बता दें कि भारतीय सेना के पास टी-72 और टी-90 भीष्म जैसे ताकतवर टैंक मौजूद हैं। बिना ट्रॉल सिस्टम के इन टैंकों को माइनफील्ड में ले जाना जोखिम भरा होता था। अब डीआरडीओ द्वारा विकसित यह सिस्टम बहुत ही एडवांस है। इससे दुश्मन द्वारा बना गए कठिन रास्तों पर भी हमारे देश के टैंक आसानी से गुजर सकेंगे। सबसे बड़ी बात यह है कि इस तकनीक के प्रयोग से टैंक की रफ्तार पर कोई असर नहीं पड़ेगा। इस डील का सबसे बड़ा पहलू इसका स्वदेशी होना है। पहले इस तरह की तकनीक के लिए भारत को रूस या अन्य यूरोपीय देशों की तरफ देखना पड़ता था। अब बीईएमएल जैसी भारतीय कंपनियां इसे देश में ही तैयार कर रही हैं। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और देश के भीतर ही हजारों लोगों को रोजगार मिलेगा। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तकनीक के सफल परीक्षण के बाद भारत भविष्य में इसे दूसरे देशों को निर्यात भी कर सकता है।





