जनप्रवाद ब्यूरो, नई दिल्ली: आगामी 5 अप्रैल यानी रविवार को विकट संकष्टी चतुर्थी मनाई जाएगी। विकट संकष्टी चतुर्थी के दिन विधिपूर्वक पूजा और व्रत करने से बुध और केतु ग्रह के अशुभ प्रभाव कम होते हैं और जीवन में सफलता के नए मार्ग खुलते हैं।
विकट संकष्टी व्रत कथा
प्राचीन काल में धर्मकेतु नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसकी दो पत्नियां थीं- सुशीला और चंचला. सुशीला स्वभाव से अत्यंत धार्मिक और सरल थी, जो अपना अधिकतर समय व्रत और उपवास में व्यतीत करती थी, जबकि चंचला का धर्म-कर्म में कोई मन नहीं था और वह सांसारिक सुखों में मग्न रहती थी। समय के साथ सुशीला को एक पुत्री और चंचला को एक पुत्र प्राप्त हुआ। इस पर चंचला ने सुशीला को ताना देते हुए कहा कि इतने व्रत करने के बाद भी उसे केवल एक पुत्री मिली, जबकि बिना किसी पूजा-पाठ के उसे पुत्र की प्राप्ति हुई है। चंचला की कड़वी बातें सुनकर सुशीला को बुरा लगा, लेकिन उसने पूरे श्रद्धा भाव से विकट संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान गणेश ने उसे एक तेजस्वी पुत्र का वरदान दिया।

कुछ समय बाद पति की मृत्यु हो जाने पर दोनों पत्नियां अलग-अलग रहने लगीं। सुशीला का पुत्र बड़ा होकर अत्यंत विद्वान बना, जिससे उनके घर में सुख-समृद्धि आ गई। इसके विपरीत, चंचला का पुत्र आलसी और गुणहीन निकला। सुशीला की उन्नति देखकर चंचला के मन में जलन उत्पन्न हो गई। एक दिन अवसर पाकर उसने सुशीला के पुत्र को कुएँ में धकेल दिया लेकिन सुशीला की भक्ति और व्रत के प्रभाव से स्वयं भगवान गणेश ने उसके पुत्र के प्राणों की रक्षा की। जब चंचला ने देखा कि भगवान स्वयं सुशीला के परिवार की रक्षा कर रहे हैं, तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने सुशीला से माफी मांगी। सुशीला के मार्गदर्शन में चंचला ने भी संकष्टी चतुर्थी का व्रत करना शुरू किया, जिससे उसका जीवन सुधर गया और उसके पुत्र को भी सद्बुद्धि प्राप्त हुई।
विकट संकष्टी चतुर्थी पूजा विधि
इस दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और व्रत का संकल्प लें। घर के मंदिर या साफ स्थान पर चौकी रखकर उस पर लाल या पीला वस्त्र बिछाएं और भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें। इसके बाद गणेश जी को पंचामृत से स्नान कराकर शुद्ध जल से अभिषेक करें। इस दिन गणेश जी को मोदक और बेसन के लड्डू का भोग लगाना शुभ माना जाता है। पूजा के बाद गणेश जी की आरती करें और रात में चंद्रोदय के समय चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें।





