जनप्रवाद ब्यूरो, नई दिल्ली: आमतौर पर बासी खाने को सेहत के लिए अच्छा नहीं माना जाता लेकिन साल में एक दिन ऐसा आता है जब बासी खाना खाया जाता है और उसी का भोग माता रानी को भी चढ़ाया जाता है। यह दिन है शीतला अष्टमी या बसौडा का। इस दिन माता रानी को एक दिन पहले बने हुए भोजन का भोग लगाया जाता है और उसी को खाया जाता है। माना जाता है कि बसौड़ा सर्दी की समाप्ति और गर्मी के आरंभ का प्रतीक है। गर्मी का आरंभ होते ही त्वचा रोग आदि शुरु हो जाते हैं इसलिए उनसे रक्षा करने के लिए माता शीतला की पूजा की जाती है। विशेष रूप से छोटे बच्चों के लिए यह पूजा की जाती है।
आगामी 11 मार्च को शीतला अष्टमी या बसौडा
शीतला माता की पूजा देश के अलग अलग भागों में अलग-अलग दिन होती है। कई क्षेत्रों में शीतला सप्तमी बसौड़ा का पर्व चैत्र कृष्ण सप्तमी को मनाया जाता है जो अबकी बार 10 मार्च को है लेकिन जहां शीतला अष्टमी का पर्व चैत्र कृष्ण पक्ष में मनाया जाता है वहां 11 मार्च को शीतला अष्टमी का पर्व मनाया जाएगा। बता दें कि मुख्य रूप से बसौड़ा उत्तर प्रदेश,बिहार, राजस्थान, हरियाणा, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्य में मनाया जाता है।

माता शीतला है देवी दुर्गा का रुप
धार्मिक मान्यता में माता शीतला को देवी दुर्गा का एक रूप माना जाता है. उन्हें गर्दभ पर सवार, हाथ में झाड़ू और कलश धारण किए दर्शाया जाता है. झाड़ू रोगों को दूर करने का प्रतीक है और कलश का जल शीतलता और शांति का संकेत माना जाता है।

शीतला अष्टमी की पूजा विधि
सप्तमी के दिन पूड़ी, पुए, हलवा, चना, दही आदि बनाकर रख लें।
अष्टमी की सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
घर या मंदिर में माता शीतला की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
रोली, अक्षत, फूल अर्पित करें और दीपक जलाएं।
ठंडे भोजन का भोग लगाएं।
शीतला माता की कथा पढ़ें या सुनें।
परिवार के स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें।
इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता और पूरा परिवार ठंडा प्रसाद ही ग्रहण करता है।





