जनप्रवाद ब्यूरो, नई दिल्ली: लोक आस्था के महापर्व चैती छठ की बुधवार यानी 25 मार्च को समाप्ति हो गई है। छठ के चौथे दिन उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देकर व्रतधारियों ने व्रत संपन्न किया। नदी और तालाबों के घाटों पर बड़ी संख्या में व्रतियों ने सूर्यदेव को जल अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना की और ठेकुआ प्रसाद का वितरण किया। चार दिवसीय महापर्व नहाय-खाय के साथ शुरू होकर, खरना और संध्या अर्घ्य के बाद उगते सूर्य की उपासना के साथ संपन्न हुआ।
चार दिनों में छठ पूजा हुई संपन्न
चार दिवसीय छठ पूजा में अलग- अलग दिन अलग- अलग तरीके से भगवान आदित्य की पूजा की जाती है। पहले दिन व्रतधारी गंगा स्नान कर सूर्यदेव को जल अर्पित करती है। इसके बाद दूसरे दिन लोहंडा खरना के दिन गुड की खीर और रोटी बनाकर छठी मैय्या को अर्पित किया जाता है। इसके बाद 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू होता है। पहले अर्घ्य वाले दिन डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है और दूसरे दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत संपन्न किया जाता है।

क्यूं मनाई जाती है छठ पूजा
छठ पूजा को लेकर कई पौराणिक कथाएं प्रसिद्ध है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, अंगराज कर्ण ने सूर्यषष्ठी पूजा की शुरुआत की। एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान श्रीराम अपने कुल पुरुष सूर्यदेव की प्रसन्नता के लिए सूर्य पूजा और छठ व्रत किया करते थे। धार्मिक कथाओं के अनुसार, 14 वर्ष के वनवास के बाद जब श्रीराम अयोध्या लौटे तब उनपर ब्रह्म हत्या (रावण वध) का पाप लगा था, जिससे मुक्ति पाने और सूर्यदेव को प्रसन्न करने के लिए भगवान राम ने सीता के साथ व्रत और पूजा की थी। हालांकि कथा में कार्तिक शुक्ल की षष्ठी का जिक्र मिलता है।
चैती छठ व्रत की दूसरा कथा
छठ पूजा से जुड़ी एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, राजा प्रियवद को कोई संतान नहीं था, जिससे वे दुखी रहते थे। एक बार महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी मालिनी को यज्ञाहुति के लिए बनाई गई खीर खिलाई, जिससे रानी गर्भवती हुई। लेकिन दुर्भाग्यवश उन्हें मृत पुत्र पैदा हुआ। इससे राजा प्रियवद और अधिक दुखी हो गए और मृत पुत्र को श्मशान ले गए। पुत्र वियोग में राजा ने भी अपने प्राण त्यागने का फैसला कर लिया लेकिन उसी समय एक मानस कन्या देवसेना प्रकट हुई, जोकि देवी षष्ठी थीं। उस देवी देवी ने राजा से कहा कि है, तुम मेरा पूजन करो और लोगों को भी इस पूजा के लिए प्रेरित करो। इससे तुम्हारा दुख दूर होगा. राजा ने पुत्र इच्छा से देवी षष्ठी का व्रत और पूजन किया। षष्ठी देवी की कृपा से राजा को स्वस्थ और सुंदर पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई।





