जनप्रवाद ब्यूरो टीम। नासा के स्फेरेक्स मिशन ने अंतरिक्ष ने ऐसी खोज की है जिससे नए ग्रहों के बनने के बारे में नवीनतम जानकारी मिल सकेगी। यह मिल्की वे में इंटरस्टेलर ग्लेशियर की खोज है। ये विशाल बफीर्ले क्षेत्र भविष्य में बनने वाले ग्रहों को पानी और जीवन के जरूरी तत्व सप्लाई करने की क्षमता रखते हैं, जिससे ब्रह्मांड में जीवन की संभावना बढ़ जाती है।
ग्रहों पर पानी कहां से आता है का खुलेगा राज
अंतरिक्ष शास्त्रियों के लिए यह हमेशा से एक बड़ा सवाल रहा है कि आखिर ग्रहों पर पानी कहां से आता है। तारों के बीच के खाली दिखने वाले स्थानों में गैस और धूल का एक शांत मिश्रण एक रहस्य माना जाता था। अब नासा ने जो डेटा पेश किया है, वह इस रहस्य से पर्दा उठा देगा। बता दें कि नासा का स्फेरेक्स मिशन एक 2-वर्षीय मिशन है। इसे 11 मार्च 2025 को लांच किया गया था। यह निकट-अवरक्त दूरबीन के जरिए 450 मिलियन से अधिक आकाशगंगाओं का 3-डी मानचित्रण कर रहा है। इसका उद्देश्य ब्रह्मांड की उत्पत्ति, आकाशगंगाओं के विकास और अंतरिक्ष में जल/जीवन के शुरूआती अणुओं की खोज करना है। अब इसी मिशन ने अंतरिक्ष में विशालकाय फैले हुए बादल देखे हैं। इसकी लंबाई विशाल है। ये सैकड़ों प्रकाश-वर्ष की दूरी तक फैले हुए हैं। इन्हीं घने और ठंडे बादलों के भीतर नए तारों का जन्म होता है।
मिल्की वे में भारी मात्रा में जमी हुई बर्फ मौजूद
नई खोज के अनुसार ब्रह्मांड की इन गहराइयों में, जहां हमें सिर्फ अनंत अंधेरा और खामोश खालीपन नजर आता है, वहां जीवन के सबसे महत्वपूर्ण बीज छिपे हैं। इस आकाशगंगा यानी मिल्की वे में भारी मात्रा में जमी हुई बर्फ मौजूद है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह कोई साधारण बर्फ नहीं है। यह यह पानी, कार्बन डाइआॅक्साइड और कार्बन मोनोआॅक्साइड का एक ऐसा जटिल मिश्रण है, जो अंतरिक्ष की सूक्ष्म धूल के कणों पर जमा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह बर्फ भविष्य में बनने वाले नए ग्रहों और सौर मंडलों के लिए पानी और जीवन की जरूरी सामग्री की सप्लाई करने वाला गोदाम साबित हो सकती है। यह खोज हमें बताती है कि पृथ्वी पर मौजूद पानी शायद अरबों साल पहले ऐसे ही ठंडे बादलों से निकलकर यहां पहुंचा होगा।
मानव जाति की उत्पत्ति से जुड़ी खोज
अध्ययनकर्ताओं अनुसर यह खोज सीधे तौर पर मानव जाति की उत्पत्ति के इतिहास से जुड़ी हुई है। हमारी पृथ्वी पर जो विशाल महासागर हैं, उनमें मौजूद पानी की हर बूंद शायद अंतरिक्ष के इन्हीं ठंडे इलाकों से आया है। मिशन के प्रमुख वैज्ञानिक फिल कोर्नगुट का कहना है कि ये बफीर्ले क्षेत्र इंटरस्टेलर ग्लेशियर की तरह काम करते हैं। जब कोई नया सौर मंडल जन्म लेता है, तो ये ग्लेशियर वहां पानी की भारी सप्लाई कर सकते हैं। फिल कोर्नगुट के अनुसार जीवन के लिए जरूरी घटक ब्रह्मांड में कोई इत्तेफाक नहीं हैं, बल्कि यह तारों के बनने की प्रक्रिया का एक अनिवार्य हिस्सा हैं। बता दें कि यह पहली बार नहीं है जब ऐसी खोज हो रही है। इससे पहले जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप और स्पिट्जर जैसे महान टेलिस्कोपों ने भी अंतरिक्ष में बर्फ के अणुओं का पता लगाया था।
हर बर्फ एक जैसी नहीं
इस खोज में सबसे महत्वपर्ण बात यह सामने आई है कि अंतरिक्ष में मिलने वाली हर बर्फ एक जैसी नहीं होती है। पानी की बर्फ और कार्बन डाइआॅक्साइड की बर्फ अलग-अलग तापमान और परिस्थितियों में बनती और मिटती रहती है। फिलहाल यह मिशन अभी रुकने वाला नहीं है। अगले कुछ सालों में यह डेटा और भी सटीक होगा। वैज्ञानिक अब उन खास क्षेत्रों पर अपनी नजरें गड़ाए हुए हैं जहां बर्फ की डेंसिटी सबसे ज्यादा है। इन जगहों पर प्रोटोस्टेलर डिस्क का अध्ययन किया जाएगा ताकि ग्रह बनने की लाइव प्रक्रिया को समझा जा सके। द एस्ट्रोफिजिकल जर्नल में छपी यह स्टडी पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों के लिए अंतरिक्ष में खोज के नए द्वार खोल रही है। आने वाले समय में, शायद हम यह भी जान पाएंगे कि क्या हमारे जैसा ही कोई और सौर मंडल जन्म ले रहा है, जहां भविष्य में कोई और सभ्यता अंगड़ाई लेगी।





