"बेटी गुस्से में पिता पर रेप का आरोप लगाए, यह कल्पना करना भी कठिन", बॉम्बे हाई कोर्ट की पिता पर तीखी टिप्पणी, आजीवन कारावास की सजा पर लगाई मुहर 

जनप्रवाद ब्यूरो, नई दिल्ली: सोचिए एक बाप जो कई वर्षों से अपनी बेटी का यौन शोषण कर रहा हो और एक दिन जब बच्ची पिता के खिलाफ आवाज उठाती है तो पिता कोर्ट में यह दलील दें कि बच्ची ने नाराजगी में शिकायत की। यह कितना हैरान कर देने वाला और अविश्वसनीय है लेकिन ऐसा ही कुछ मुबंई में हुआ है। दरअसल, यह मामला 2018 का है जब मुंबई के एक स्कूल में 'पुलिस दीदी' जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम के दौरान 10वीं कक्षा में पढ़ने वाली एक छात्रा ने स्कूल काउंसलर को अपनी आपबीती सुनाई। उसने आरोप लगाया कि उसका पिता कई वर्षों से उसका यौन शोषण कर रहा है।

पॉक्सो (POCSO) की विशेष अदालत ने 2020 में इस मामले में सुनवाई करते हुए आरोपी पिता को दोषी पाया और उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। इसी सजा के खिलाफ आरोपी ने हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। अपनी अपील में पिता ने एक अजीबोगरीब तर्क दिया। उसने दावा किया उसकी बेटी ने उसे इसलिए फंसाया, क्योंकि उसने उसे पढ़ाई बीच में ही छोड़ने के लिए मजबूर किया था। पिता का कहना था कि उन्होंने अपनी बेटी को अनुशासन सिखाने के लिए उसको पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर किया जिससे उसके मन में नाराजगी पैदा हो गई। पिता का दावा था कि इसी बात से नाराज होकर और गुस्से में आकर उसकी बेटी ने उसे झूठे मामले में फंसाया।

पिता की इस दलील को न्यायमूर्ति मनीष पिताले और न्यायमूर्ति श्रीराम शिरसात की खंडपीठ ने बेहद मनगढ़ंत करार दिया। अदालत ने फैसले के दौरान कहा, "यह मानना ​​अत्यधिक कठिन है कि केवल पढ़ाई छुड़ाने जैसी नाराजगी के कारण कोई बेटी अपने पिता के खिलाफ इतना गंभीर और घिनौना आरोप लगाएगी। पीड़िता का बयान पूरी तरह विश्वसनीय है और इसमें सच्चाई नजर आती है। अदालत ने कहा कि पिता द्वारा अपनी अनुशासन की कार्रवाई को बचाव के रूप में इस्तेमाल करना स्वीकार्य नहीं है। खंडपीठ ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए पिता की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखते हुए उसकी दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि पिता द्वारा अपनी अनुशासन की कार्रवाई को बचाव के रूप में इस्तेमाल करना स्वीकार्य नहीं है।