चांद को लेकर वैज्ञानिकों ने किया अब तक का सबसे बड़ा खुलासा 

जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। चांद को लेकर वैज्ञानिकों ने अब तक का सबसे बड़ा खुलासा किया है। इस शोध ने पूरी दुनिया में चल रहे चंद्रयान मिशनों की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार चांद की सतह पर हजारों दरारें मिली हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार चांद का अंदरूनी हिस्सा धीरे-धीरे ठंडा हो रहा है। इससे चांद का आकार छोटा हो रहा है। 
वैज्ञानिकों को चंद्रमा पर मिली हजारों दरारें 


चंद्रमा जितना शांत दिखाई देता है, उसकी सतह के भीतर उतनी ही हलचल हो रही है। वैज्ञानिकों को चंद्रमा पर हजारों दरारें मिली हैं। ये दरारें उसके सिकुड़ने की कहानी बयां करती हैं। नासा के लूनर रिकॉनिसेंस आॅर्बिटर कैमरा की तस्वीरों का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों ने यह जानकारी दी है। उनके अनुसार चांद की सतह पर 10 हजार से ज्यादा ऐसे फॉल्ट मिले हैं, जहां कभी भी भूकंप आ सकते हैं।  वैज्ञानिकों के अनुसार चांद का अंदरूनी हिस्सा धीरे-धीरे ठंडा हो रहा है. इससे चांद का आकार छोटा हो रहा है। पिछले करीब 40 करोड़ साल में चांद की त्रिज्या लगभग 45 मीटर कम हुई है। इस खोज ने चंद्रयान मिशनों की सुरक्षा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शोधकर्ताओं का कहना है कि चांद पर इंसानों को उतारने की तैयारी कर रहे नासा के आर्टेमिस मिशन के लिए सुरक्षित जगह चुनना और जरूरी हो गया है। यह स्टडी द प्लैनेटरी साइंस जर्नल में प्रकाशित हुई है। 
लूनर रिकॉनिसेंस आर्बिटर कैमरा 

बता दें कि नासा का लूनर रिकॉनिसेंस आर्बिटर कैमरा पहले से ही चांद पर मौजूद है। नासा को यह लगातार तस्वीरें भेजता रहता है। यह कैमरा चंद्रमा की सतह पर मौजूद पहाड़ों, दरारों और दूसरी संरचनाओं के बारे में जानकारी जुटाता है। अध्ययन में 17 वर्षों के दौरान जुटाई गई तस्वीरों और सतह से जुड़ी जानकारियों का इस्तेमाल किया गया। वैज्ञानिकों का कहना है कि चंद्रमा का जन्म करीब 4.5 अरब साल पहले हुआ था। वैज्ञानिकों का मानना है कि उस समय एक बड़ी वस्तु पृथ्वी से टकराई थी। इस टक्कर से निकला गर्म मलबा अंतरिक्ष में फैल गया। धीरे-धीरे यह मलबा एक साथ जुड़ा और चंद्रमा बना। शुरूआत में चंद्रमा का अंदरूनी हिस्सा काफी गर्म था। तब से यह धीरे-धीरे ठंडा हो रहा है। अंदरूनी पदार्थ के ठंडा होने से उसका आकार घटता है। इसी प्रक्रिया के कारण चंद्रमा भी सिकुड़ रहा है। नासा के अनुसार चंद्रमा के ठंडा होने और सिकुड़ने से उसकी ठोस बाहरी सतह पर दबाव पड़ता है। इससे चट्टानों में दरारें बन सकती हैं और सतह का एक हिस्सा दूसरे हिस्से के ऊपर खिसक सकता है। इसी प्रक्रिया से चंद्रमा पर छोटी चट्टानी दीवार जैसी संरचनाएं बनती हैं।
10 हजार से ज्यादा नई दरारें

अध्ययन में वैज्ञानिकों ने चंद्रमा की सतह पर 10 हजार से ज्यादा नई दरारों का जिक्र है। अध्ययन में 8,900 से ज्यादा थ्रस्ट फॉल्ट स्कार्प्स यानी दबाव के कारण बनी चट्टानी दीवार जैसी संरचनाओं की भी पहचान की गई। ये आंकड़े चंद्रमा की सतह पर मौजूद दरारों और उनसे जुड़ी संरचनाओं को समझने में मदद करते हैं। इन संरचनाओं से पता चलता है कि चंद्रमा की सतह पर दबाव के कारण बदलाव हो रहे हैं। इन्हें समझने के लिए वैज्ञानिकों ने उनकी लंबाई, ऊंचाई और फैलाव का अध्ययन किया। उन्होंने चंद्रमा के उन हिस्सों में मौजूद चट्टानी संरचनाओं को भी देखा, जहां कभी लावा फैला था। इन जानकारियों को मिलाकर उन्होंने चंद्रमा के आकार में हुए बदलाव का अनुमान लगाया। अध्ययन के अनुसार पिछले करीब 40 करोड़ वर्षों में चंद्रमा की रेडियस में लगभग 42 से 46 मीटर की कमी आई है। अगर पिछले 40 करोड़ वर्षों में सिकुड़ने की दर एक जैसी रही हो, तो चंद्रमा की रेडियस हर 10 लाख साल में अधिकतम करीब 11 सेंटीमीटर कम हुई होगी। चंद्रमा पर भूकंप आने के कारणों पर वैज्ञानिकों ने कहा कि इसके कई कारण हैं। पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के खिंचाव से चंद्रमा के अंदरूनी हिस्से में हलचल होती है। उल्कापिंडों के टकराने से भी कंपन पैदा हो सकता है। इसके अलावा, चंद्रमा के ठंडा होकर सिकुड़ने और सतह पर मौजूद चट्टानों में दबाव बढ़ने से भी भूकंप आ सकते हैं। नासा के अनुसार चंद्रमा के सिकुड़ने से आने वाले कुछ उथले मूनक्वेक रिक्टर पैमाने पर 5.5 तक की तीव्रता के हो सकते हैं। ये चंद्रमा की सतह से करीब 20 से 30 किलोमीटर नीचे आ सकते हैं और 10 मिनट से ज्यादा समय तक चल सकते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि तापमान में बदलाव के कारण चट्टानों के फैलने और सिकुड़ने से भी सतह के पास हलचल पैदा हो सकती है। भविष्य में चंद्रमा पर अंतरिक्ष यात्रियों को भेजने और वहां लंबे समय तक रहने की योजनाएं बनाई जा रही हैं। इसके लिए ऐसी जगह चुनना जरूरी है, जहां भूकंपीय गतिविधि और जमीन खिसकने का खतरा कम हो।