दुश्मनों के सर्वनाश के लिए इंडियन नेवी तैयारी, नई तकनीक पर जोर

जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। अपने दुश्मनों के सर्वनाश के लिए इंडियन नेवी अब आधुनिक तकनीकों का प्रयोग बढ़ाने जा रही है। इसमें एआई से लेकर ऐसी तकनीक शामिल होंगी जिसके बारे में अभी तक केवल सुना है। नौसेना उपप्रमुख वाइस एडमिरल अजय कोचर ने इसको लेकर बड़े संकेत दिए। 
नौसेना ने तैयारियां की तेज 

पश्चिम एशिया के मौजूदा हालात और उभरते संघर्ष के बीच नौसेना ने अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। इसमें कई तरह की तकनीक शामिल है। नौसेना उपप्रमुख वाइस एडमिरल अजय कोचर ने इस बारे में कई अहम जानकारियां साझा की। उन्होंने कहा कि नौसेना एक बहु क्षेत्रीय नेटवर्क बल बनने के लिए आसमान से लेकर समुद्र तक काम कर रही है। इसके लिए एआई, क्वांटम प्रौद्योगिकी और मिसाइल तक सभी क्षेत्रों में विकास पर काम चल रहा है। उन्होंने नौसेना के आधुनिकीकरण पर जानकारी देते हुए कहा कि 42 सैन्य प्लेटफॉर्म के आर्डर दिए जा चुके हैं। वहीं 2.14 लाख करोड़ रुपये की परियोजनाओं को मंजूरी मिल चुकी है। दिल्ली में 26 और 27 अक्टूबर को होने वाले स्वावलंबन 2026 सम्मेलन में नौसेना, स्टार्टअप और उद्योग जगत के प्रतिनिधि हिस्सा लेंगे। इसमें ड्रोन, अंडरवॉटर आटोनॉमस व्हीकल, क्वांटम तकनीक और डायरेक्टेड एनर्जी वेपन जैसी आधुनिक तकनीकों पर फोकस रहेगा। नौसेना का लक्ष्य है कि भारत में ही ऐसी आधुनिक तकनीक विकसित की जाए, जिससे देश की समुद्री सुरक्षा मजबूत हो और महत्वपूर्ण रक्षा जरूरतों के लिए विदेशी निर्भरता कम की जा सके।
लॉन्ग रेंज एंटी-शिप मिसाइल 

इसी क्रम में डीआरडीओ द्वारा विकसित लॉन्ग रेंज एंटी-शिप मिसाइल एलआर-एएसएचएम हाइपरसोनिक मिसाइल को 2027 से 2029 के बीच सेवा में शामिल करने की योजना है। इस मिसाइल की रेंज लगभग 1500 किलोमीटर है। यह हाइपरसोनिक स्पीड पर टारगेट को भेद सकती है। शुरूआती उत्पादन दर 10 से 15 यूनिट प्रति वर्ष रहेगी, जो बाद में बढ़ाकर 25 से 40 यूनिट तक पहुंच सकती है। बता दें कि एलआर-एएसएचएम एक बूस्ट-ग्लाइड हाइपरसोनिक मिसाइल है। यह दो स्टेज वाले सॉलिड रॉकेट मोटर से लांच होती है। यह हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल के रूप में लक्ष्य की ओर बढ़ती है। इसकी अधिकतम स्पीड 12,348 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच सकती है। 1500 किलोमीटर की दूरी तय करने में इसे करीब 15 मिनट लगते हैं। यह स्थिर और गतिशील दोनों तरह के लक्ष्यों को निशाना बना सकती है। खासकर दुश्मन के युद्धपोतों को मिसाइल की उड़ान पथ जटिल और अनिश्चित होता है। जिससे दुश्मन के रडार और इंटरसेप्शन सिस्टम को इसे रोकना मुश्किल हो जाता है। यह भारतीय नौसेना की तटीय बैटरियों के लिए विकसित की जा रही है। भविष्य में जहाज और हवा से लॉन्च होने वाले संस्करण भी संभव हैं। स्वदेशी सेंसर और एवियोनिक्स सिस्टम इसकी सटीकता बढ़ाते हैं।
मिसाइल के सफल परीक्षण किए 


डीआरडीओ ने इस मिसाइल के कई सफल परीक्षण किए हैं। ओडिशा तट पर हुए परीक्षणों में 1500 किलोमीटर की रेंज और टर्मिनल गाइडेंस की पुष्टि हुई है। गणतंत्र दिवस परेड में भी इसका प्रदर्शन हो चुका है। अब यह सीरियल प्रोडक्शन चरण में प्रवेश कर चुकी है। उपयोगकर्ता मूल्यांकन परीक्षणों के बाद इसे सशस्त्र बलों में शामिल किया जाएगा। यह विकास भारत की आत्मनिर्भर भारत पहल का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बता दें कि हाइपरसोनिक तकनीक में भारत अमेरिका, रूस और चीन जैसे देशों की कतार में शामिल हो चुका है। ऐस्ो में यह मिसाइल हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की सुरक्षा के लिए गेम चेंजर साबित हो सकती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि पारंपरिक एंटी-शिप मिसाइलों की तुलना में इसकी रेंज और स्पीड कहीं ज्यादा है। ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक मिसाइलों से आगे बढ़कर यह दुश्मन के विमान वाहक और बड़े युद्धपोतों को दूर से ही नष्ट करने की क्षमता रखती है। इससे भारत की समुद्री शक्ति और प्रतिरोधक क्षमता में बड़ा इजाफा होगा।