जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। डीआरडीओ ने ओडिशा के एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से कुशा लांग रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल का पहला सफल उड़ान परीक्षण किया। कुशा प्रणाली के बारे में कहा जा रहा है कि यह लड़ाकू विमान, क्रूज मिसाइल, ड्रोन समेत अन्य हवाई खतरों को लंबी दूरी से मार गिराने में सक्षम है। यह भारत की स्वदेशी लंबी दूरी की वायु रक्षा प्रणाली की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। इसे एस-400 का विकल्प बताया जा रहा है।
रक्षा क्षेत्र में ताकत बढ़ा रहा है भारत
डिफेंस यानी रक्षा क्षेत्र में भारत लगातार अपनी ताकत बढ़ाता जा रहा है। भारतीय सेना को अब तक बेहद एडवांस और कई खतरनाक हथियार मिल चुके हैं। इसकी पूरी दुनिया में डिमांड है। भारत के पास अग्नि से लेकर ब्रह्मोस और अस्त्र जैसी मिसाइल हैं। इस लिस्ट में अब एक और नया नाम जुड़ गया है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन यानी डीआरडीओ ने ओडिशा तट पर स्थित एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से कुशा लांग रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल का पहला सफल उड़ान परीक्षण किया। यह परीक्षण भारत के स्वदेशी लंबी दूरी के एयर डिफेंस कार्यक्रम प्रोजेक्ट के लिए एक बड़ी सफलता माना जा रहा है। इसका उद्देश्य देश के लिए ऐसी स्वदेशी वायु रक्षा प्रणाली तैयार करना है। इससे लंबी दूरी से आने वाले हवाई खतरों को रोकना आसान हो जाएगा।
रूस के एस-400 एयर से तुलना
प्रोजेक्ट कुशा की तुलना रूस के एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम से हो रही है। इसके पीछे इस सिस्टम में पाई जाने वाली विविधता है। इनकी तुलना की जाए तो दोनों का उद्देश्य लंबी दूरी से आने वाले हवाई खतरों को रोकना है। प्रोजेक्ट कुशा को भारत की स्वदेशी लंबी दूरी की वायु रक्षा प्रणाली के रूप में विकसित किया जा रहा है। जिसकी सबसे लंबी दूरी वाली इंटरसेप्टर मिसाइल 350 से 400 किलोमीटर तक लक्ष्य को निशाना बनाने में सक्षम होगी। यह प्रणाली लड़ाकू विमान, स्टील्थ विमान, ड्रोन, क्रूज मिसाइल, प्रिसिजन गाइडेड हथियार और कुछ श्रेणी की बैलिस्टिक मिसाइलों जैसे खतरों को इंटरसेप्ट करने के लिए तैयार की जा रही है। साथ ही इसे भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम से भी जोड़ने की तैयारी है। इस रक्षा प्रणाली से कई हवाई खतरों पर एक साथ नजर रखकर कार्रवाई की जा सकेगी। डीआरडीओ ने इसे एस-400 का सीधा विकल्प नहीं बताया है, लेकिन इसकी लंबी मारक क्षमता और आधुनिक वायु रक्षा क्षमताओं के कारण इसकी तुलना एस-400 से की जा रही है। कुशा के पास प्रिसिजन गाइडेड हथियारों और कुछ श्रेणी की बैलिस्टिक मिसाइलों को भी इंटरसेप्ट करने की क्षमता है। इसका उद्देश्य भारत को स्वदेशी लंबी दूरी की मजबूत वायु रक्षा क्षमता उपलब्ध कराना है। बता दें कि कुशा सिस्टम लंबी दूरी और अलग-अलग ऊंचाई पर हवाई खतरों को रोक सकता है। इसमें तीन प्रकार की इंटरसेप्टर मिसाइलें शामिल होंगी। पहली एम-1 इंटरसेप्टर मिसाइल की मारक क्षमता लगभग 150 किलोमीटर होगी। वहीं एम-2 इंटरसेप्टर की मारक क्षमता लगभग 250 किलोमीटर होगी। इसी तरह एम-3 इंटरसेप्टर की मारक क्षमता 350 से 400 किलोमीटर तक होगी।
कुशा के काम-काज के तरीकों पर बात
कुशा मिसाइल प्रणाली के काम-काज के तरीकों पर बात करें तो इस इंटरसेप्टर मिसाइलों की गति लगभग मैक 5.5 रहने की उम्मीद है। इस प्रणाली में आधुनिक रडार, फायर कंट्रोल सिस्टम और नेटवर्क आधारित कमांड इंफ्रास्ट्रक्चर का इस्तेमाल किया जाएगा। भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड इस परियोजना में रडार प्रणाली और समग्र एकीकरण का प्रमुख औद्योगिक साझेदार है। यह प्रणाली भारतीय वायुसेना के इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम के साथ जुड़कर एक साथ कई हवाई खतरों की वास्तविक समय में पहचान और उन पर कार्रवाई करने में सक्षम होगी। इससे भारत की आयातित रणनीतिक एयर डिफेंस सिस्टम पर निर्भरता भी कम होने की उम्मीद है।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दी बधाई
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मिसाइल परीक्षण का वीडियो शेयर करते हुए पूरी टीम को बधाई दी। उन्होंने कहा कि डीआरडीओ ने आज ओडिशा के तट पर एपीजे अब्दुल कलाम आइलैंड से लॉन्ग-रेंज सरफेस-टू-एयर मिसाइल कुशा का पहला फ्लाइट टेस्ट सफलतापूर्वक किया है। कुशा मिसाइल सिस्टम एक बड़ी रेंज और ऊंचाई वाले इलाके में फाइटर जेट, मिसाइल, यूएवी और दुश्मन के बड़े एयरक्राफ्ट सहित कई तरह के हवाई खतरों को बेअसर करने में सक्षम है। इससे ऐसे सिस्टम के लिए इम्पोर्ट पर निर्भरता भी खत्म हो जाएगी और यह देश की एयर डिफेंस क्षमता में एक बड़ी छलांग है।





