जन प्रवाद, ब्यूरो।
नोएडा। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अंतर धार्मिक विवाह और लिव इन संबंधों को लेकर एक खास फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बालिक व्यक्तियों को पसंद के साथ रहने और विवाह करने का मौलिक अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि संविधान एक जीवंत दस्तावेज है जो समय के साथ समाज की बदलती जरूरतों के हिसाब से खुद को ढालता है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्मांतरण प्रतिषेध अधिनियम 2021 अंतरधार्मिक विवाह पर रोक नहीं लगाता। विवाह पंजीकरण अधिकारी सिर्फ इस आधार पर विवाह पंजीकरण से इंकार नहीं कर सकता कि संबंधित पक्षों ने धर्मांतरण के लिए जिला प्राधिकारी से पूर्व अनुमति नहीं ली है। अदालत ने कहा कि ऐसी अनुमति अनिवार्य नहीं बल्कि निर्देशात्मक है। इसे अनिवार्य माना जाए तो यह संविधान के अनुच्छेद 14-21 की कसौटी पर खरा नहीं उतरेगा। अंतर धार्मिक विवाह करने या लिव इन रिलेशन में रहने वाले दर्जनों जोड़ों ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर संरक्षण देने की मांग की थी। याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए न्यामूर्ति विवेक कुमार सिंह ने यह निर्णय दिया है।

शासनादेश का पालन जरूरी
अदालत ने वर्ष 2019 में जारी राज्य सरकार के उस शासनादेश का हवाला दिया जिसमें अंतर्जातीय या अंतरधार्मिक विवाह करने वाले जोड़ों को सुरक्षा सुरक्षित आवास और आवश्यक संरक्षण देने के लिए निर्देश दिए थे। अदालत ने कहा कि शासनादेश का कड़ाई से पालन किया जाए। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि जीवनसाथी चुनना व्यक्ति की स्वतंत्रता का अभिन्न हिस्सा है और इसमें राज्य या समाज हस्तक्षेप नहीं कर सकते। कोर्ट के इस फैसलेके बाद उन लोगों को बड़ी राहत मिली है जो लिव इन में रहते हैं और अंतरधार्मिक विवाह करना चाहते हैं। इसमें अब सरकार या फिर जिलाप्राधिकारी या कोई अन्य व्यक्ति परेशान नहीं करता।





