19 राज्यों के 181 जिलों में की खिसक रही है जमीन, 7500 जगह पर भूस्खलन का बढ़ गया खतरा 

जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। मुंबई के घाटकोपर इलाके में आज सुबह भूस्खलन हो गया। इसकी चपेट में आने से कई लोग दब गए। हादसे में अब तक 2 लोगों के मारे जाने की खबर सामने आई है। राहत और बचाव कार्य जारी है। इस हादसे के बीच  भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण की बेहद चौंकाने वाली रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार देश के 19 राज्यों के 181 जिलों में की जमीन खिसक रही है। इससे 7500 जगह पर भूस्खलन का खतरा बढ़ गया है। 
मुंबई के घाटकोपर पश्चिम इलाके में आज सुबह बड़ा हादसा हो गया। नवाज चॉल में लोग सो रहे थे, तभी अचानक पहाड़ का एक बड़ा हिस्सा झोपड़ियों पर गिर गया। इस भूस्खलन की चपेट में करीब 6-7 झोपड़ियां आ गईं। अब तक दो लोगों के मारे जाने की खबर है। बताया जा रहा है कि मलबे में कई लोगों के दबे होने की आशंका है। पुलिस ने बताया कि घटना सुबह करीब चार बजे घटी। महाराष्ट्र पुलिस, एनडीआरएफ की टीमें मौके पर मौजूद हैं। साथ ही एंबुलेंस की गाड़ियां भी मौके पर तैनात हैं ताकि घायलों को तुरंत अस्पताल पहुंचाया जा सके। मुंबई की मेयर रितु तावड़े भी मौके पर पहुंची। उन्होंने राहत और बचाव कार्य की समीक्षा की। बता देश में भूस्खलन की यह पहली घटना नहीं है। केरल के वायनाड में इस साल भारी बारिश के दौरान अलग-अलग जगहों पर लैंडस्लाइड हुई थी। इसमें चार गांव - मुंडक्कई, चूरलमाला, अट्टामाला और नूलपुझा बह गए थे। घर, पुल, सड़कें और गाड़ियां भी बह गईं थी। इस हादसे में करीब 84 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। इसके अलावा भी भूस्खल की घटनाएं समाने आ चुकी हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो की रिपोर्ट के अनुसार, रुद्रप्रयाग भूस्खलन के लिहाज से देश का सबसे संवेदनशील जिला बन गया है। इसके बाद बाद टिहरी का स्थान है। इसरो की लैंडस्लाइड एटलस आॅफ इंडिया में 17 राज्यों के 147 जिलों का विश्लेषण किया गया। इसमें उत्तराखंड के सभी 13 जिलों को शामिल किया गया था। जिसमें रुद्रप्रयाग पहले और टिहरी दूसरे स्थान पर है। केरल का त्रिशूर जिला तीसरे, जबकि उत्तराखंड का चमोली जिला 19वें स्थान पर है। इसरो की रिपोर्ट के बाद भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट सामने आई है। इसमतें 4.3 लाख वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र को भूस्खलन संभावित क्षेत्र में शामिल किया है। रिपोर्ट के अनुसार देश के पहाड़ी और संवेदनशील इलाकों में भूस्खलन का खतरा लगातार गंभीर बना हुआ है। देश के 19 राज्यों के 181 जिलों में करीब 7,500 ऐसी जगहें चिन्हित की गई हैं जहां जमीन खिसकने का खतरा बेहद ज्यादा है। हिमालयी क्षेत्र, पूर्वोत्तर और पश्चिमी घाट सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र हैं। रिपोर्ट के अनुसार भूस्खल का खतरा महज सिर्फ आम आबादी तक सीमित नहीं है। परिवहन गलियारों, सामरिक अवसंरचना और रक्षा प्रतिष्ठानों पर भी इसका असर पड़ सकता है। 
पश्चिमी घाट सबसे संवेदनशील 

रिपोर्ट के अनुसार हिमालयी क्षेत्र, पूर्वोत्तर के राज्य और पश्चिमी घाट भूस्खलन के लिहाज से सबसे संवेदनशील माने जा रहे हैं। जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश सहित कई राज्यों और संघ राज्य क्षेत्रों में लगातार जमीन खिसकने की घटनाओं का खतरा बना हुआ है। बता दें  कि रक्षा भू-सूचना अनुसंधान प्रतिष्ठान इन क्षेत्रों में जोखिम का आकलन कर रहा है और समय रहते चेतावनी देने के लिए तंत्र विकसित किया गया है। आपदा प्रबंधन पर गृह मंत्रालय की संसदीय समिति की 261वीं रिपोर्ट में भी चेतावनी दी गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भूस्खलन से महत्वपूर्ण अवसंरचना और परिवहन गलियारों को भारी नुकसान पहुंच सकता है। इससे निपटने के लिए हिम सुरक्षा सुरंग, छतनुमा सुरक्षा कवच, रिटेनिंग वॉल, अवरोध बांध और हिमस्खलन अवरोध टीले तैयार किए जा रहे हैं। खासकर पहाड़ी सड़कों पर बरसात के दौरान खतरा बढ़ जाता है। कई रणनीतिक क्षेत्रों में सड़कें और दूसरी सुविधाएं रक्षा व्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण हैं, इसलिए यहां भूस्खलन का असर सामान्य यातायात से कहीं ज्यादा गंभीर हो सकता है। संसदीय समिति ने संवेदनशील पहाड़ी इलाकों में अनियंत्रित निर्माण रोकने की सिफारिश की है। अति संवेदनशील ढलानों और पर्यटन स्थलों पर निर्माण कार्य सीमित करने के साथ वनों की कटाई रोकने की बात कही गई है। भूस्खलन और दूसरी प्राकृतिक आपदाओं से निपटने के लिए आपदा प्रबंधन के बजट में भी बड़ा प्रावधान किया गया है। 2021-22 से 2025-26 के लिए राष्ट्रीय आपदा मोचन निधि यानी एनडीआरएफ के तहत 54,770 करोड़ रुपये का बजट मंजूर किया गया था। अब 16वें वित्त आयोग ने आपदा वित्तपोषण के लिए 2,83,807 करोड़ रुपये के कोष की सिफारिश की है।