जन प्रवाद, ब्यूरो।
नोएडा। अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य के हालात ऐसे हैं कि कब क्या हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। यहां फंसे जहाजों के लिए सिर्फ ईरान ही खतरा नहीं बल्कि इजरायल और अमेरिका के ड्रोन भी मंडराते रहते हैं। यही वजह है कि समय से तीन गुना ज्यादा वक्त इन जहाजों को अपने गंतव्य तक पहुंचने में लग रहा है। एक टैंकर यूएई के रुवाइस पोर्ट से एलपीजी लोड कर रहा था तभी इजरायल और अमेरिका ने ईरान पर अचानक हमला कर दिया। इसके बाद पूरे क्षेत्र में जहाजों की आवाजाही रोक दी गई।
इस टैंकर में चालक दल के 27 सदस्य सवार थे। जो खौफ में जी रहे हैं और उनके सिर पर रोजाना मिसाइल और ड्रोन मंडराते रहते हैं। बताया जा रहा है कि यह टैंकर 11 मार्च को रवाना होना था लेकिन बिगड़े हालात के चलते उसे 23 मार्च तक अनुमति नहीं मिल सकी। इसके बाद इसे लारक द्वीप के उत्तर में एक संकरे रास्ते से जाने को कहा गया। इसके बाद बड़ा रिक्स लेकर चालक दल वहां से रवाना हुआ। जोखिम भरे हालातों के बीच आखिरकार यह जहाज भारत पहुंच गया। न्यू मंगलौर बंदरगाह पर करीब 45000 टन एलपीजी लेकर जहाज पहुंचा। साथ ही एक और टैंकर कांदला बंदरगाह पर 47 हजार टन एलपीजी लेकर पहुंचा।

बता दें कि इस पूरे अभियान में भारतीय नौसेना ने पूरी मदद की। बताया जा रहा है कि चार भारतीय युद्धपोतों ने पाइन गैस को ओमान से अरब सागर तक करीब 20 घंटे तक सुरक्षा प्रदान की। बता दें कि युद्ध के चलते एलपीजी की आपूर्ति में बाधा आने की आशंका थी, जिससे भारत में संभावित कमी को लेकर चिंता बढ़ गई थी। बता दें कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि ईरान ने भारतीय जहाजों के गुजरने के लिए कोई अतिरिक्त समझौता का शुल्क नहीं ली। यह पूरी प्रक्रिया परिस्थितियों के अनुसार और बिना किसी ब्लैंकेट एग्रीमेंट के हुई।
बताते चले कि भारत लगातार एलपीजी गैस की किल्लत को कम करने के लिए प्रयासरत है। लेकिन, होर्मुज जलडमरूमध्य के जो हालात हैं वह किसी से छुपे नहीं हैं। आलम यह है कि जिस शिप को भारत पहुंचने में एक सप्ताह का समय लगता था वह अब तीन गुना समय लेकर भारत बड़ी ही जटिल परिस्थितियों में पहुंच पा रहा है। यही कारण है कि भारत में एलजीपी गैस की किल्लत लगातार बढ़ रही है।





