जनप्रवाद ब्यूरो, टीम। शुक्र ग्रह को लेकर वैज्ञानिकों ने अब तक का सबसे बड़ा खुलासा किया है। शोधकर्ताओं के अनुसार शुक्र पर पृथ्वी वाले जीव छिपे बैठे हैं। करोड़ों साल पहले एक उल्कापिंड के साथ हुई टक्कर से ये जीव वहां पहुच गए थे।
शुक्र का तापमान काफी ज्यादा
शुक्र ग्रह अपनी तपती सतह और बादलों के लिए पहचाना जाता है। अब तक यह माना जा रहा था कि शुक्र एक डेड ग्रह है। यहां की सतह का तापमान इतना ज्यादा है कि सीसा पिघल सकता है। इन तथ्यों के इतर वैज्ञानिकों की नजर हमेशा वहां के बादलों पर रही है, जहां का माहौल धरती जैसा है। इन्हीं बदलों को लेकर नई और बेहद सनसनीखेज रिसर्च सामने आई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि शुक्र ग्रह के बादलों में सूक्ष्म जीव यानी माइक्रोबियल लाइफ है। शोधकर्ताओं का मानना है कि यह जीवन धरती से ही वहां पहुंचा है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह कोई मिथक यह कोरी परिकल्पना नहीं बल्कि इसके पीछे ठोस गणितीय मॉडल और पैनस्पर्मिया की थ्योरी काम कर रही है।
जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी की खोज
जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी की एक टीम ने वीनस लाइफ इक्वेशन के जरिए नया दावा पेश किया है। उनके अनुसार अरबों साल पहले पृथ्वी से टकराने वाले उल्कापिंडों ने धरती के सूक्ष्मजीवों को शुक्र तक पहुंचा दिया था। बता दें कि लूनर एंड प्लेनेटरी साइंस कॉन्प्रेंस के भी अध्ययन में यह बात सामने आई है। यह अध्ययन बताता है कि पृथ्वी से निकले उल्कापिंड आसानी से शुक्र गृहों पर पहुंच सकते हैं। वैज्ञानिकों की इस खोज में यह दावा किया गया है कि जीवन एक गृह से दूसरे गृह में आसानी से पहुंच सकता है। रिसर्च में कहा जा रहा है कि शुक्र के बादलों में जीवन मौजूद है।
पैनस्पर्मिया सिद्धांत कर रहा काम
पैनस्पर्मिया सिद्धांत की बात करें तो यह ब्रह्मांड में जीवन के प्रसार को समझने के लिए बेहद पुरानी और मान्य थ्योरी है। इस थ्योरी के अनुसार जीवन किसी एक ग्रह तक सीमित नहीं रहता है। जब किसी बड़े एस्टेरॉयड या उल्कापिंड की टक्कर किसी ग्रह से होती है, तो वहां की मिट्टी और मलबे के टुकड़े अंतरिक्ष में उछल पड़ते हैं। इन टुकड़ों में मौजूद बैक्टीरिया या जीवन के जरूरी तत्व सालों तक अंतरिक्ष की कड़ाके की ठंड और रेडिएशन को झेलते हुए दूसरे ग्रहों तक पहुंच जाते हैं। वैज्ञानिक दशकों से इस बात पर बहस कर रहे थे कि क्या ऐसा पृथ्वी और मंगल के बीच हुआ होगा। अब वैज्ञानिकों का पूरा फोकस शुक्र ग्रह की तरफ मुड़ गया है।
सैंडिया नेशनल लेबोरेटरीज का शोध]
जॉन्स हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी और सैंडिया नेशनल लेबोरेटरीज के वैज्ञानिकों ने इस पर नया गणितीय मॉडल पेश किया है। जिसे वीनस लाइफ इक्वेशन कहा जा रहा है। इस मॉडल के अनुसार, पिछले 1 अरब सालों में पृथ्वी से करीब 20 अरब जीवित कोशिकाएं शुक्र के बादलों तक पहुंच चुकी होंगी। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि हर साल कम से कम 100 कोशिकाएं शुक्र के वातावरण में सुरक्षित रूप से फैलती हैं। ये वे हार्डकोर बैक्टीरिया हैं जो अंतरिक्ष के निर्वात और रेडिएशन को झेल सकते हैं। बता दें कि शुक्र की सतह से लगभग 50 किलोमीटर ऊपर बादलों की परत में तापमान और दबाव पृथ्वी जैसा ही है। हाल ही में शुक्र के बादलों में फॉस्फीन गैस मिली थी। यह पृथ्वी पर जीवित जीवों द्वारा पैदा की जाती है। इसी खोज ने इस चर्चा को हवा दी है कि क्या शुक्र पर मौजूद जीवन वास्तव में हमारे अपने ग्रह का ही वंशज है। इनका डीएनए भी पृथ्वी के जीवों से मेल खाता है। इस महीने यानी अप्रैल 2026 में हुई साइंस कॉन्फ्रेंस में सैंडिया नेशनल लेबोरेटरीज के रिसर्चर्स ने बताया कि उन्होंने ऐसे सबूत देखे हैं, जो बताते हैं कि आॅर्गेनिक मैटेरियल वायुमंडल में प्रवेश के दौरान होने वाली भीषण गर्मी को झेल सकता है। इसका मतलब है कि शुक्र पर जीवन होने की संभावना अब सिर्फ एक कल्पना नहीं रह गई है। यह रिसर्च जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी वैसे-वैसे नए तथ्य भी सामने आएंगे।





