जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। तीन राज्यों की तीन सीटों पर हुए उप चुनाव में दो सीटों पर भाजपा को हार मिली। वहीं गुजरात की एक सीट पर पार्टी ने जीत हासिल की। इसमें बिहार की बांकीपुर, मध्य प्रदेश की दतिया और गुजरात की मांजलपुर सीट शामिल रही। इन सीटों पर सबसे ज्यादा चर्चा बिहार की बांकीपुर सीट की हो रही है। यह हार इसलिए बड़ी है क्योंकि यह भाजपा की परंपरागत सीट मानी जाती रही है।
बांकीपुर विधानसभा सीट से पीके की जीत
सबसे पहले बात करते हैं बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट की। यह सीट भाजपा की परंपरागत सीट रही है। बता दें कि भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन के इस्तीफे के बाद यहां पर चुनाव हुए थे। यहां से जन सुराज पार्टी के प्रमुख प्रशांत किशोर ने बीजेपी उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा को 19,000 से ज्यादा वोटों के अंतर से हराकर जीत हासिल की। वहीं आरजेडी की उम्मीदवार रेखा गुप्ता तीसरे स्थान पर रहीं। बता दें कि नवंबर के विधानसभा चुनावों में नितिन नवीन ने यह सीट लगभग 52,000 वोटों के अंतर से जीती थी। वहीं आठ महीने के बाद 19000 वोटों से भाजपा को इस सीट से हार का सामना करना पड़ा। बांकीपुर विधानसभा सीट 20 साल तक नितिन नवीन के पास रही, उससे पहले, यह सीट दो कार्यकाल तक उनके पिता, नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा के पास थी। इसक मतलब है कि 1995 से यह सीट नितिन नवीन के परिवार के पास थी। ऐसे में यहां से भाजपा की हार ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
नए विकल्प की खोल दी खिड़की
राजनीतिक चश्मे से देखा जाए तो बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के नतीजे ने राज्य में नई राजनीति और नए विकल्प की खिड़की खोल दी है। इस नतीजे ने एक ओर जहां सत्तारूढ़ राजग और विपक्षी महागठबंधन के लिए खतरे की घंटी बजा दी है, वहीं मुख्यधारा के दलों को युवाओं की आकांक्षाओं को लेकर सचेत होने का संदेश भी दिया है। नतीजे बताते हैं कि इस चुनाव में न सिर्फ राजग का अगड़ा-अति पिछड़ा फार्मूला फेल हुआ बल्कि राजद का मुस्लिम-यादव समीकरण भी औंधे मुंह गिर गया। इस नतीजे के कई गहरे राजनीतिक निहितार्थ तलाशे जा रहे हैं। महज एक वर्ष पूर्व जिस जनसुराज पार्टी के 238 में से 236 उम्मीदवारों ने जमानत गंवा दी थी, उसी पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने अपने पहले ही चुनाव में भाजपा को उसके सबसे मजबूत गढ़ में पटखनी दी है। भाजपा उम्मीदवार का आधार स्वजातीय कायस्थ और दूसरे अगड़े वर्ग के कुछ हिस्से तक ही सीमित रह गया। वहीं राजद के वोट बैंक में आई 30 हजार वोटों की कमी बताता है कि उसके मूल यादव-मुस्लिम मतदाता ने इस बार उससे दूरी बना ली है। बांकीपुर उपचुनाव के नतीजे ने बीते दो दशक से भी अधिक समय से चली आ रही एनडीए बनाम महागठबंधन राजनीति को सीधे तौर पर चुनौती दी है। यह चुनाव यह सबक दे रहा है कि अब राजनीतिक दलों को परंपरागत राजनीति से हटकर लोगों की अपेक्षाओं पर खरा उतरना होगा। अगर पार्टियों ने ऐसा नहीं किया तो जब भी जनता के सामने कोई मजबूत उम्मीदवार होगा वह नए और साफ सुथरे छवि वाले प्रत्याशी को वोट करना पंसद करेगी। पीके की जीत के पीछे भी यही कारण रहा। बता दें कि पिछले विधानसभा चुनाव में उन्होंने खुद चुनाव नहीं लड़ा था लेकिन इस बार वे सीधे मैदान में उतरे।
विधानसभा का बदल जाएगा परिदृश्य
पीके के इस जीत से बिहार विधानसभा का परिदृश्य में बदलता दिख रहा है। अभी तक आरजेडी के निशाने पर सत्ताधारी गठबंधन हुआ करता था। साथ ही भाजपा नेता लालू परिवार पर निशाना साधा करते थे। अब प्रशांत किशोर के विधानसभा पहुंचने से एक नया विपक्ष बन जाएगा। यानी इस बार भाजपा और आरजेडी दोनों पीके के निशाने पर होंगे। बता दें कि पीके सम्राट चौधरी पर कथित आपराधिक मामलों और शैक्षणिक योग्यता को लेकर बार-बार निशाना साधते रहे हैं। वहीं तेजस्वी यादव भी हमेशा उनके निशाने पर रहे हैं। अब ये दोनों नेताओं को पीके के तीखे वार को सहन करना मुश्किल होगा।
दतिया सीट से कांग्रेस की जीत
दूसरी ओर मध्य प्रदेश कांग्रेस ने विधानसभा उपचुनाव में दतिया सीट बरकरार रखी। इस कड़े मुकाबले में दतिया के पूर्व राजघराने के सदस्य कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने भाजपा के आशुतोष तिवारी को 6,000 से अधिक वोटों से हराया। भाजपा के लिए यह सीट इसलिए अहम थी क्योंकि मुख्यमंत्री मोहन यादव के नेतृत्व में यह बीजेपी की पहली बड़ी चुनावी परीक्षा थी। यहां भाजपा की हार के कई कारण रहे। भाजपा की हार की एक बड़ी वजह उम्मीदवार चयन में हुई चूक भी मानी जा रही है। यहां छह बार विधायक और पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को टिकट न देकर उनकी जगह आशुतोष तिवारी को मैदान में उतारा। क्षेत्रीय लोगों का मानना है कि घनश्याम सिंह दतिया राजघराने से आते हैं। ऐसे में इलाके में उनका ज्यादा प्रभाव रहा है। कांग्रेस ने जैसे ही घनश्याम सिंह को उम्मीदवार घोषित किया, उसके पक्ष में माहौल बनने लगा। घनश्याम सिंह को दिवंगत माधवराव सिंधिया के करीबी माना जाता रहा है। वे 1993 और 2003 में दतिया से विधायक रह चुके हैं। 2008 में नरोत्तम मिश्रा के चुनावी राजनीति में आने के बाद उन्होंने यह सीट छोड़ दी थी। वहीं आशुतोष के पास खुद की राजनीतिक जमीन नहीं थी। वे केवल भाजपा का चेहरा थे। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अगर नरोत्तम मिश्रा को यहां से टिकट मिलता तो शायद भाजपा यहां से जीत जाती। मिश्रा 2008 से लगातार तीन बार इस सीट से विधायक रहे थे। वे 2023 के चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र भारती से हार गए थे। बता दें कि भारती को एक आपराधिक मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद यह उपचुनाव कराना पड़ा।
मिश्रा का टिकट कटने पर हुआ था बवाल
मिश्रा को टिकट न मिलने पर यहां काफी बवाल देखने को मिला था। मिश्रा के समर्थकों ने ग्वालियर-दतिया राजमार्ग जाम कर दिया था। प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया और आंसू गैस के गोले छोड़े. काफी मान-मनौव्वल के बाद यह विरोध शांत हुआ था। इसके बाद मुख्यमंत्री की मौजूदगी में ही मिश्रा भावुक हो गए थे। साथ ही दतिया के भाजपा जिला अध्यक्ष ने विरोध में इस्तीफा दे दिया था। इस सीट पर भले ही नरोत्तम मिश्रा प्रचार किया लेकिन उनके बेटे ने प्रचार से दूरी बनाए रखी। इससे भाजपा कार्यकर्ताओं में गलत संदेश गया। इसके अलावा चुनाव प्रचार के शुरूआती दौर में भाजपा ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को उपचुनाव का प्रभारी बनाया था लेकिन बाद में यह जिम्मेदारी ग्वालियर से सांसद भरत सिंह कुशवाह को दे दी गई। इसको पार्टी के भीतर तालमेल की कमी के तौर पर देखा गया।
भाजपा का मजबूत गढ़ रही मांजलपुर
भाजपा का मजबूत गढ़ रही गुजरात के वडोदरा की मांजलपुर विधानसभा सीट पर बीजेपी ने एक बार फिर अपना दबदबा कायम रखा। यहां उप चुनाव में सतेंद्रभाई पटेल ने कांग्रेस के भीखाभाई रबारी को 30,630 वोटों से करारी शिकस्त दी। उन्हें कुल 55481 वोट मिले। साथ ही कांग्रेस के भीखाभाई रबारी को 24851 वोट मिले। यहां 2012 से चला आ रहा बीजेपी की जीत का सिलसिला कायम रहा। बता दें कि यह सीट योगेश पटेल के निधन के बाद खाली हुई थी। उन्होंने 2022 के विधानसभा चुनाव में एक लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी। यहां शुरुआत से ही भाजपा की एकतरफा जीत मानी जा रही थी। इस सीट के इतिहास की बात करें तो भाजपा के स्वर्गीय विधायक योगेश पटेल इस इलाके से 8 बार विधायक रहे थे। मांजलपुर सीट अस्तित्व में आने के बाद उन्होंने तीन बार जीत हासिल की। पिछले चुनाव हालात यह थे कि कांग्रेस यहां अपनी जमानत भी नहीं बचा पाई थी। इस बार अंतर यह हुआ कि कांग्रेस प्रत्याशी अपनी जमानत बचाने में सफल रहे। यहां भाजपा की सीट के पीछे पीएम मोदी रहे। यहां पूरा का पूरा भाजपा प्रत्याशी के चेहरा न लड़कर पीएम मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ा गया। इसका लाभ भाजपा को हमेशा की तरह इस बार भी मिला। वहीं कांग्रेस की हार के पीछे उसका सांगठनिक ढांचा रहा। बता दें कि शहरी इलाकों में कांग्रेस हमेशा से कमजोर रही है। शहरी इलाकों में कांग्रेस का संगठन न के बराबर है। यही वजह रही कि कम मतदान के बावजूद कांग्रेस भाजपा को टक्कर नहीं दे पाई। यहां 40 प्रतिशत से भी कम मतदान हुआ। इस बार सिर्फ 80 हजार से ज्यादा मतदान हुआ। यह किसी भी राजनीतिक दल के लिए अच्छा संकेत नहीं माना जा रहा है।





