जन प्रवाद, ब्यूरो।
नोएडा। भाजपा ने राज्यसभा की दस सीटों के चुनाव के लिए आठ उम्मीदवारों की घोषणा कर दी। इससे बीजेपी ने उच्च सदन के गठित के साथ ही 2027 के विधानसभा चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव तक को साधने की कोशिश की। सूची में पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देकर पार्टी ने मूल काडर को यह संदेश दे दिया है कि संगठन में लंबी पारी और निष्ठा का सदैव सम्मान होगा। अगड़ों के बीच बनी नाराजगी को थामने के साथ पिछड़े और दलित वर्गों को भी मजबूती से जोड़ने का भाजपा ने काम किया।
पार्टी ने मौजूदा आठ राज्यसभा सदस्यों में किसी को दोबारा मौका नहीं दिया। केंद्रीय मंत्री बीएल वर्मा और पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह जैसे पश्चिमी यूपी के प्रभावशाली चेहरों को भी सूची से बाहर रखा। इसके उलट कैबिनेट मंत्री धर्मपाल को राज्यसभा भेजकर पार्टी ने पश्चिमी यूपी में पिछड़े नेतृत्व की नई धुरी खड़ी करने का संकेत दिया है। वहीं, रुहेलखंड के कद्दावर कुर्मी नेता और झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार की पुत्री श्रुति के चयन ने परिवारवाद और संगठनात्मक निष्ठा के बीच भाजपा की कसौटी को लेकर नया सवाल खड़ा कर दिया है।
यह सूची इसलिए अहम मानी जा रही है कि क्योंकि भाजपा 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारी के निर्णायक दौर में है। ऐसे समय में राज्यसभा के लिए चेहरे चुनना महज दिल्ली भेजने की कवायद नहीं, बल्कि अलग-अलग सामाजिक समूहों, क्षेत्रों और संगठनात्मक धड़ों को संदेश देने का जरिया भी है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में लोधी समाज के नेतृत्व को लेकर पिछले कुछ समय से बीएल वर्मा और राजवीर सिंह के बीच राजनीतिक दूरी और वर्चस्व की चर्चाएं हो रही थीं। बीएल वर्मा कभी कल्याण सिंह के काफी नजदीकी माने जाते थ्, जबकि राजवीर सिंह पिता की राजनीतिक विरासत के स्वाभाविक दावेदार माने जाते हैं। दोनों का राज्यसभा सूची से बाहर रहना सामान्य घटनाक्रम नहीं हो सकता। इसके उलट आंवला से कई बार विधायक रहे पशुधन मंत्री धर्मपाल को राज्यसभा भेजने का फैसला पश्चिमी यूपी के लोधी मतदाताओं के बीच नेतृत्व के नए चेहरे को आगे बढ़ाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

आठ नामों में अधिकांश ऐसे चेहरे हैं जिनकी राजनीतिक पहचान भाजपा संगठन से बनी है। इनमें प्रियंका सिंह रावत और श्रुति कटियार को अपेक्षाकृत नया चेहरा माना जा सकता है। वहीं गोपीकृष्ण पांडेय, राधाकांत ओझा, धर्मपाल सिंह, प्रकाश पाल, विद्यासागर सोनकर और रामप्रताप सिंह जैसे नामों के जरिये पार्टी ने पुराने काडर को संकेत दिया है कि लंबे समय तक संगठन के लिए काम करने वालों के लिए उच्च सदन का रास्ता खुला है। सामाजिक समीकरण भी इसी रणनीति का हिस्सा है। तीन अगड़े, तीन पिछड़े और दो दलित चेहरों के जरिए भाजपा ने अपने परंपरागत सवर्ण आधार को साधने के साथ ओबीसी और दलित मतदाताओं को भी प्रतिनिधित्व का संदेश दिया है।
झारखंड के राज्यपाल और बरेली से कई बार सांसद रहे संतोष गंगवार की पुत्री होने के कारण श्रुति का चयन भाजपा के भीतर परिवारवाद के सवाल को फिर सामने लाता है। भाजपा लंबे समय से विपक्षी दलों पर यही आरोप लगाती रही है। ऐसे में संगठन की पृष्ठभूमि के बावजूद राजनीतिक परिवार से आने वाली श्रुति को राज्यसभा भेजने का फैसला पार्टी की कसौटियों पर सवाल खड़े करता है। हालांकि, इसे पश्चिमी यूपी में कुर्मी समाज को साधने की कोशिश के रूप में भी देखा जा रहा है।
राज्यसभा की सूची में क्षेत्रीय संतुलन भले पूरी तरह बराबर न दिखता हो, लेकिन सामाजिक और संगठनात्मक संदेश अधिक स्पष्ट है। भाजपा ने एक तरफ अगड़ों के बीच संभावित नाराजगी को कम करने की कोशिश की है, वहीं पिछड़ों और दलितों को भी यह भरोसा देने का प्रयास किया है कि उनका प्रतिनिधित्व सुरक्षित है।





