जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। भारत की रक्षा प्रौद्योगिकी वैश्विक स्तर पर अपनी पहचान कायम कर रही है। यही कारण है कि स्वदेशी मिसाइल अस्त्र के खरीदारों की संख्या बढ़ रही है। इंडोनेशिया के बाद अब आर्मेनिया और सऊदी अरब भी भारत से अस्त्र मिसाइल की खरीद करेगा।
रक्षा क्षेत्र में भारत का बज रहा डंका
आज के दौर में रक्षा क्षेत्र में भारत का डंका बज रहा है। भारतीय मिसाइल तकनीक की दुनिया मुरीद हो रही है। इंडोनेशिया के बाद आर्मेनिया और सऊदी अरब ने भी भारत की दुश्मन की नजर से बचने में सक्षम स्वदेशी अस्त्र मिसाइल में दिलचस्पी दिखाई है। बता दें कि पीएम मोदी की हालिया इंडोनेशिया यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल के साथ-साथ हवा से हवा में वार करने वाली स्वदेशी अस्त्र मिसाइल पर भी सहमति बनी थी। अब आर्मेनिया और सऊदी अरब भी भारत के साथ अस्त्र पर बातचीत कर रहे हैं। आने वाले दिनों में कुछ और देश भी इसमें दिलचस्पी दिखा सकते हैं। सूत्रों के मुताबिक इस साल फरवरी में तत्कालीन सीडीएस जनरल अनिल चौहान की आर्मेनिया यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच इस पर चर्चा हुई थी। अब आर्मेनिया अस्त्र मिसाइल खरीदने की रेस में सबसे आगे चल रहा है।
एयर-टू-एयर मिसाइल है अस्त्र
बता दें कि अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल है। इसे डीआरडीओ ने डेवलेप किया है। यह बियॉन्ड-विजुअल-रेंज एयर-टू-एयर मिसाइल है। यानी यह मिसाइल फाइटर जेट्स को बिना दुश्मन के सीधे संपर्क में आए, विजुअल रेंज से बहुत दूर तबाह कर सकती है। यह 100 किलोमीटर दूर तक कुछ सेकंड में टारगेट का खात्म करने की क्षमता रखती है। डीआरडीओ ने ने अस्त्र मिसाइल में एक्टिव रडार सीकर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया है। यह अंतिम क्षणों में दुश्मन के लड़ाकू विमानों को ट्रैक कर उन्हें सटीक निशाना बनाती है। एक बार टारगेट लॉक हो जाने पर दुश्मन के विमान का इससे बचना नामुमकिन हो जाता है। अस्त्र की सबसे बड़ी खूबी इसका अलग-अलग फाइटर जेट के साथ आसानी से इंटीग्रेट हो जाना है। इसे भारतीय वायुसेना के फ्रंट लाइन के फाइटर जेट सुखोई-30 एमके आई
और स्वदेशी एलसीए तेजस के साथ पहले ही इंटीग्रेट किया जा चुका है। भविष्य में इसे तेजस और भारत के पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट के लिए भी मुख्य हथियार के रूप में शामिल किया जाएगा।
सबसे मुफीद सौदा साबित
रक्षा सूत्रों का कहना है कि आर्मेनिया के लिए यह तकनीकी रूप से सबसे मुफीद सौदा साबित हो सकता है। आर्मेनिया अपने सुखोई-30 बेड़े के आधुनिकीकरण के लिए भारत के अनुभव का लाभ उठाने का इच्छुक है। दोनों देश निगरानी प्रणालियों, अंतरिक्ष, साइबर सुरक्षा, सामरिक संचार और प्रशिक्षण में सहयोग की संभावनाएं भी तलाश रहे हैं। इसी तरह सऊदी अरब की वायुसेना में अमेरिकी और ब्रिटिश लड़ाकू विमान हैं। वह इन विमानों के लिए कम लागत वाली अच्छी मिसाइल की तलाश कर रहा है। ऐसे में अस्त्र मिसाइल की किफायती लागत और बेहतरीन जैमिंग-रोधी तकनीक ने रियाद का ध्यान खींचा है। सऊदी अरब अपने रक्षा आयात में विविधता लाना चाहता है। यदि अस्त्र का एकीकरण सऊदी अरब के एफ-15 और यूरोफाइटर टाइफून जैसे लड़ाकू विमानों पर होता है, तो यह भारतीय रक्षा उद्योग के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जाएगी। पश्चिमी प्लेटफॉर्मों पर भारतीय मिसाइलों के एकीकरण का रास्ता खोल सकती है।





