ईरान में जा गिरे अमेरिका के दो पायलट

जन प्रवाद, ब्यूरो। 
नई दिल्ली। अपने दो पायलटों को बचाने के लिए अमेरिका को ओसामा बिन लादेन से भी बड़ा ऑपरेशन चलाना पड़ा। हालांकि, अमेरिका अपने पायलटों को बचाने में कामयाब रहा, लेकिन अमेरिका का जो नुकसान हुआ उसने डोनाल्ड ट्रंप को सोचने पर मजबूर कर दिया। बता दें कि दो अप्रैल 2026 को अमेरिका का एफ-15ई फाइटर जेट ईरान में गिर गया। इसमें दो पायलट सवार थे। अमेरिका के लिए ये सिर्फ सैन्य चुनौती नहीं बल्कि राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का सवाल था। इसलिए अपने पायलटों को बचाने के लिए अमेरिका ने पायलट रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया। अगर भूल से भी दोनों पायलट आईआरजीसी के हाथ लग जाते तो यह अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए बहुत ही शर्मिंदा का विषय बन जाता। 


यही वजह रही कि अमेरिका को विशेष रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू करना पड़ा। अमेरिका ने इसके लिए एमसी130जे स्पेशल आप्स विमान, ब्लैक हॉक हेलिकॉप्टरा, ड्रोन नेवी सील्स कमांडो उतारने पड़े। यानी अमेरिका ने सब कुछ दांव पर लगा दिया। मीडिया रिपोट्स के मुताबिक रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान अमेरिकी विमानों और ड्रोन को निशाना बनाया गया। बताया जा रहा है कि अमेरिका के 100-100 मिलियन डॉलर के दो एमसी-130जे ईरान की जिस हवाईपट्टी पर उतरे वे फिर उड़ नहीं पाए। एक ब्लैक हेलिकॉप्टर भी वहीं तबाह हो गया। जैसे-तैसे पायलटों को वहां से निकाला जा सका। अमेरिका को अपने ही दो पायलटों को बचाने के लिए बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। बता दें कि अमेरिका को अपने पायलटों को बचाने में तो कामयाबी मिल गई लेकिन जमीनी जंग का अभियान चकनाचूर हो गया। ऐसी भी खबरें हैं कि अमेरिकी सेना जमीनी जंग के लिए तैयार नहीं थी। बताया जा रहा है कि ईरान की स्टैटजी और युद्ध की उसकी तैयारियों को नजरअंदाज किया गया। ईरान को सिर्फप्रतिबंधों और कमजोर इकोनॉमी के नजरिए से देखा गया। लेकिन फारस की खाड़ी का भूगोल, ईरान की मिसाइल क्षमता और उसकी वॉर स्टैटजी  को नजरअंदाज किया गया। 


अगर भौगोलिक दृष्टि से देखें तो फारस की खाड़ी कोई खेल का मैदान नहीं जहां अमेरिका जब चाहे वहां उतर जाए। फारस की खाड़ी एक संकरा समुद्री रास्ता है। ईरान के पास छोटी-छोटी नाव हैं। साथ ही एंटी शिप मिसाइलों का पूरा नेटवर्कहै। यह नेटवर्क बड़े से बड़े वॉरशिप को भी मात दे सकता है। बता दें कि इसके साथ ईरान का एयर डिफेंस सिस्टम भी कमजोर नहीं है। इस युद्ध से खाड़ी देश डरे और सहमे हुए हुए हैं। अमेरिका के साथ खुलकर कोई भी देश आना नहीं चाहता है। उन्हें डर है कि अगर ऐसा हुआ तो ईरान उन देशों को भी टॉरगेट करेगा। अब ईरान के साथ जमीनी लड़ाई आसान नहीं रह गई है।