जनप्रवाद ब्यूरो। वैज्ञानिकों ने एक ऐसा सौर मंडल खोज निकाला है जो पृथ्वी के सौरमंडल से उल्टा है। यहां ग्रहों के निर्माण का क्रम पथरीला-गैसीय और गैसीय-पथरीला है। यह हमारे सौर मंडल के नियम के बिल्कुल विपरीत है। वैज्ञानिकों का मानना है कि बाहरी पथरीला ग्रह तब बना जब सिस्टम में गैस खत्म हो चुकी थी। इस खोज ने अब तक की सारी थ्योरी को फेल कर दिया है।
अनगिनत रहस्यों का केंद्र है अंतरिक्ष
अंतरिक्ष अनगिनत रहस्यों का केंद्र माना जाता है। यहां जितनी खोज की जाती है उतने ही राज बाहर आते रहते हैं। कई बार तो ऐसा होता है, हम ब्रह्मांड में जो देखते हैं, वह हमारी कल्पना से परे होता है। अंतरिक्ष को लेकर सालों से खगोलशास्त्री एक नियम को पत्थर की लकीर मानते आए थे। वह नियम था कि किसी भी सौर मंडल में छोटे और पथरीले ग्रहों का निर्माण सूर्य के पास हुआ होगा। वहीं गैस से भरे विशाल ग्रहों का निर्माण स्वतंत्र रूप से दूर हुआ होगा। हमारे सौर मंडल में भी ऐसा ही है। बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल सूर्य के करीब हैं। वहीं बृहस्पति और शनि जैसे गैसीय ग्रह सूर्य से दूर हैं।
एलएचएस 1903 नामक ग्रह
अब हाल ही में एलएचएस 1903 नामक ऐसे तारों के समूह की खोज की है, जिसने वैज्ञानिकों की इस सोच को पूरी तरह बदल दिया है। वैज्ञानिकों ने इसकी खोज आकाशगंगा के डिस्क वाले हिस्से में की है। यहां एक लाल बौने तारों का समूह है। ये तारे हमारे सूर्य की तुलना में काफी ठंडे और कम चमकदार हैं। जब इंटरनेशनल टीम ने अलग-अलग टेलिस्कोप के डेटा का एनालिसिस किया तो उन्हें जो मिला उसने सबके होश उड़ा दिए। इस अजीबोगरीब व्यवस्था को वैज्ञानिकों ने इनसाइड आउट सिस्टम नाम दिया है। यह खोज यूनिवर्सिटी आफ वारविक के वैज्ञानिकों ने की है। यहां के स्ट्रोफिजिसिस्ट थॉमस विल्सन का मानना है कि पथरीले ग्रह आमतौर पर अपने तारे से इतनी दूर नहीं बनते। यह खोज उस हर चीज को चुनौती देती है जिसे हम ग्रहों के बनने के बारे में जानते थे।
बदल जाएगी पुरानी थ्योरी
ग्रहों के निर्माण के बारे में पुरानी थ्योरी को समझें तो कई तथ्य बाहर आएंगे। तारे के पास के ग्रहों के पथरीला होने के कई कारण है। तारे की तेज रेडिएशन वहां मौजूद गैसों को उड़ा देती है। जिससे सिर्फ ठोस चट्टानी हिस्सा ही बचता है। वहीं, दूर के इलाकों में तापमान कम होने की वजह से ग्रह भारी मात्रा में हाइड्रोजन और हीलियम जमा कर पाते हैं। ये ग्रह गैस जायंट्स बन जाते हैं। वहीं एलएचएस 1903 ग्रहों के समूह ने इस नियम को तोड़ दिया है। वैज्ञानिकों ने इसके बारे में कई संभावनाओं पर विचार किया। उन्होंने संभावना जताई है कि शायद इन तारों ने अपनी जगह बदल ली है। एक संभावना और है कि शायद किसी भारी टक्कर की वजह से ग्रहों की गैस खत्म हो गई।
वैज्ञानिकों ने पेश की एक नई संभावना
इस गुत्थी को सुलझाने के लिए वैज्ञानिकों ने एक नई संभावना पेश की है। उनके अनुसार माना जाता है कि सौर मंडल के सभी ग्रह प्रोटोप्लैनेटरी डिस्क यानी गैस और धूल का घेरा एक साथ बनते हैं। एलएचएस 1903 के मामले में ऐसा लगता है कि यहां के ग्रह धीरे-धीरे यानी सीक्वेंस में बने। वैज्ञानिकों का मानना है कि जब तक चौथे और सबसे बाहरी ग्रह के बनने की बारी आई तब तक उस सिस्टम से सारी गैस खत्म हो चुकी थी। विल्सन का मानना है कि यह पहला सबूत है कि कोई ग्रह गैस से खाली वातावरण में भी बन सकता है। जब गैस बची ही नहीं, तो वह ग्रह चाहकर भी गैस जायंट नहीं बन पाया। एक छोटी पथरीली दुनिया बनकर रह गया। एलएचएस 1903 की खोज ने साबित कर दिया है कि ब्रह्मांड में ग्रह बनने के कई और भी तरीके हो सकते हैं। जिन्हें समझना अभी बाकी है। चेओप्स स्पेस टेलिस्कोप द्वारा की गई यह खोज भविष्य के मिशनों के लिए एक नया रास्ता खोलेगी।





