स्पेशवॉर की तैयारी में अमेरिका,  पृथ्वी की कक्षा में तैनात किए  खतरनाक स्पेस कंट्रोल हथियार  

जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। आने वाले समय में महाशक्तियों के बीच युद्ध का स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा। यह युद्ध जमीन में नहीं अंतरिक्ष में होगा। पहली बार अमेरिका ने इस बात को स्वीकार किया कि उसने पृथ्वी की कक्षा में खतरनाक स्पेस कंट्रोल हथियार तैनात कर रखे हैं। ये पृथ्वी की कक्षा में घूम रहे हैं। नए स्पेश वार की तैयारी केवल अमेरिका ने ही नहीं की बल्कि रूस, चीन और भारत पीछे नहीं हैं।
गोल्डन डोम मिसाइल डिफेंस योजना 

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका की अंतरिक्ष ताकत बढ़ाने और मिसाइलों से बचाव की व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दे रहे हैं। उनकी गोल्डन डोम मिसाइल डिफेंस योजना भी इस बात की गवाह है कि अमेरिका इस नए युद्ध के लिए खुद को तैयार कर रहा है। अमेरिकी रक्षा जानकारों का मानना है कि इस योजना का मकसद अमेरिका को अलग-अलग तरह की मिसाइलों हमले से बचाना है। इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा कि पृथ्वी की कक्षा में स्पेस को कंट्रोल करने वाले खतरनाक हथियार तैनात किए हैं। बता दें कि इससे पहले अमेरिकी वायुसेना के सचिव ट्रॉय मिंक ने 14 सितंबर 2026 को मैरीलैंड में आयोजित एयर, स्पेस और साइबर कॉन्फ्रेंस में बड़ा खुलासा किया था। उन्होंने कहा था कि अमेरिका के पास ऐसे हथियार हैं, जो दुश्मन की कार्रवाई से अमेरिकी सैन्य बलों की रक्षा करने में सक्षम हैं।  बता दें कि ये सैन्य उपकरण लंबे समय से वायुमंडल के बाहर तैनात किए जाते रहे हैं, लेकिन ये पहली बार है जब किसी हथियार को कक्षा में रखने की बात मानी गई है। 
60 साल पुरानी स्पेस संधि पर चर्चा

अमेरिका के इस खुलासे के बाद 60 साल पुरानी स्पेस संधि चर्चा में आ गई है। इस संधि की शुरूआत 1966 में हुई थी। उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने अंतरिक्ष के इस्तेमाल को लेकर एक अंतरराष्ट्रीय संधि का प्रस्ताव रखा था। 27 जनवरी 1967 को अमेरिका, सोवियत संघ और ब्रिटेन ने वॉशिंगटन, मॉस्को और लंदन में इस संधि पर साइन किए थे। यह संधि 10 अक्टूबर 1967 से लागू हुई थी। इसका मुख्य मकसद अंतरिक्ष को परमाणु हथियारों और दूसरे सामूहिक विनाश के हथियारों की तैनाती से बचाना था। नई रिपोर्ट के खुलासे से इस संधि पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। मीडिया में जारी रिपोर्टों के अनुसार रूस और चीन जैसे देश भी इसी तरह की तकनीकों पर तेजी से काम कर रहे है। जिसने वैश्विक स्तर पर स्टार वॉर्स यानी अंतरिक्ष में हथियारों की एक नई होड़ को जन्म दे दिया है। इन सबके बीच सवाल ये है कि इन उभरते स्टॉर वॉर्स में भारत कहां खड़ा है और क्या उसके पास दुश्मन के सैटेलाइट को गिराने की क्षमता है? बता दें कि शीत युद्ध के समय से ही अंतरिक्ष का इस्तेमाल सैन्य निगरानी, नेविगेशन और संचार के लिए किया जा रहा है। आधुनिक समय में अमेरिका के जीपीएस और भारत के नाविक जैसे सिस्टम सैन्य अभियानों की रीढ़ बने हुए हैं। अब 21 सदी में यह स्थिति बदल गई है। कई देश ऐसे यान और सैटेलाइट विकसित कर रहे हैं जो सीधे दुश्मनों के अंतरिक्ष यानों पर हमला कर सकें और उन्हें निष्क्रिय कर सकें। 2022 में चीन ने शिजियान-21 सैटेलाइट के जरिए एक बेकार सैटेलाइन को रोबोटिक आर्म से पकड़कर उसकी कक्षा बदल दी थी। वहीं 2024 में अमेरिका की तत्कालीन बाइडेन प्रशासन ने दावा किया था कि रूस एक अंतरिक्ष- आधारिक परमाणु हथियार विकसित कर रहा है। यह लंबे समय तक अंतरिक्ष में रह सकता है और अपने आस-पास के सैटेलाइट को नष्ट करने की क्षमता रखता है। अन्य देशों की इस तैयारी को देखते हुए भारत भी सक्रिय हो गया है। रिपोर्ट के अनुसार फिलहाल भारत ने अंतरिक्ष आधारित हथियार तैनात नहीं किए हैं। इसके बावजूद अपनी सुरक्षा के लिए भारत के पास दुश्मन के सैटेलाइट को मार गिराने की पूरी क्षमता मौजूद है। भारत ने 2019 में मिशन शक्ति के जरिए ये क्षमता दिखाई थी। उसने आॅर्बिट में सैटेलाइट को सफलतापूर्वक नष्ट किया था। बता दें कि मिशन शक्ति के तहत डीआरडीओ ने ओडिशा के एपीजे अब्दुल कलाम द्वीप से पृथ्वी डिफेंस व्हीकल मार्क-आर इंटरसेप्टर मिसाइल के जरिए लो-अर्थ आॅर्बिट में मौजूद अपने ही माइक्रोसैट- सैटेलाइट को बिना किसी विस्फोटक के, केवल सीधी टक्कर से सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया था। इस सफलता के साथ ही भारत अमेरिका, रूस और चीन के बाद एएसएटी क्षमता हासिल करने वाला चौथा देश बन गया था। बता दें कि अंतरिक्ष में सैटेलाइट्स को नष्ट करने वाली तकनीक को एंटी-सैटेलाइट हथियार यानी एएसएटी कहा जाता है। इसका सबसे सीधा तरीका मिसाइल हमला है, जिसे काइनेटिक डायरेक्ट-एसेंट कहा जाता है। इसमें जमीन, हवा या समुद्र से लांच की गई मिसाइल बेहद तेज रफ़्तार से सीधे सैटेलाइट से टकराकर उसे नष्ट कर देती है।