जनप्रवाद ब्यूरो, नोएडा। सेमीकंडक्टर बनाने की तैयारी के लिए भारत अब सिर्फ चिप कारखाने लगाने तक सीमित नहीं रहने वाला है। चिप बनाने के लिए जरूरी मशीन, रसायन, सामग्री, गैस और पैकेजिंग तकनीक भी देश में लाने की तैयारी है। भारतीय कंपनियों के साथ दुनिया के दिग्गज सेमीकंडक्टर कंपनियों ने बड़ा समझौता किया है।
सेमीकंडक्टर हब बनाने की तैयारी
केंद्र सरकार भारत को सेमीकंडक्टर हब बनाने की तैयारी में है। दिल्ली के यशोभूमि में सेमीकॉन इंडिया 2026 के पांचवें एडिशन में दुनिया की बड़ी चिप कंपनियां पहुंची हैं। इसमें उनके प्रतिनिधि, नीति-निर्माता और निवेशक शािमल हैं। सभी की नजर भारत के उस उद्योग पर जमी हैं जिसे भारत ने लगभग शून्य से खड़ा किया है। अब भारत में सेमीकंडक्टर यानी चिप निर्माण की पूरी कहानी दुनिया के सामने होगी। करीब एक दशक पहले भारत में इस उद्योग की मौजूदगी बहुत मामूली थी। इसलिए यह आयोजन सिर्फ एक सम्मेलन नहीं है, यह वह मौका है जब भारत की सेमीकंडक्टर बनाने की महत्वाकांक्षा पूरी दुनिया के सामने आएगी। इस कार्यक्रम के जरिए भारत ने अपना पूरा प्लान दुनिया के सामने पेश कर दिया है। इसके तहत भारत सेमीकंडक्टर क्षेत्र में पैकेजिंग से आगे बढ़कर घरेलू चिप डिजाइन, कच्चे माल और आपूर्ति शृंखला की क्षमता विकसित करने पर जोर दे रहा है। नई परियोजनाओं से अगले दो वर्षों में 75 प्रतिशत क्षमता हासिल होने की उम्मीद है। इससे स्मार्टफोन, लैपटॉप और एआई क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक को बढ़ावा मिलेगा। 2030 तक सेमीकंडक्टर बाजार 100 से 110 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।
सेमीकॉन 2.0 का आयोजन
सेमीकॉन 2.0 के पहले दिन दुनिया में भारत की धमक भी देखने को मिली। कई भारतीय कंपनियों के साथ दुनिया के दिग्गज सेमीकंडक्टर कंपनियों ने समझौता किया। खासतौर पर टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स ने जापान, यूरोप, मलेशिया और सिंगापुर की कंपनियों के साथ 16 समझौते किए हैं। बता दें कि ये समझौते इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि भारत में इस समय चिप निर्माण की कई परियोजनाएं एक साथ आगे बढ़ रही हैं। गुजरात के धोलेरा में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और पीएसएमसी की करीब 91 हजार करोड़ रुपये की चिप फैक्टरी तैयार हो रही है। यहां 90, 55 और 28 नैनोमीटर तकनीक वाले चिप बनाने की योजना है। इसकी प्रस्तावित क्षमता करीब 50 हजार वेफर प्रतिमाह है। वहीं, असम में टाटा की सेमीकंडक्टर पैकेजिंग इकाई भी तैयार हो रही है। इसकी क्षमता करीब 4.8 करोड़ इकाई प्रतिदिन बताई गई है। यानी भारत में अब सिर्फ चिप बनाने की फैक्टरी नहीं लग रही है। उसके लिए जरूरी रसायन, मशीन, विशेष सामग्री, गैस, पानी और पैकेजिंग तकनीक की व्यवस्था भी देश में विकसित की जा रही है।
कंपनियों ने भारत में काम करने की इच्छा जताई
जिन कंपनियों ने भारत में काम करने की इच्छा जताई है उनके बारे में बात करें तो इसमें नेक्सपीरिया प्रमुख है। यह कंपनी बिजली के प्रवाह को नियंत्रित करने वाले सेमीकंडक्टर बनाती है। इनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक वाहन, चार्जिंग व्यवस्था, बिजली प्रबंधन और औद्योगिक उपकरणों में होता है। साथ ही बीईएसआई ने भी भारत में चिप निर्माण की इच्छा जताई है। यह कंपनी चिप बनाने के बाद उसे अंतिम रूप देने में इस्तेमाल होने वाली मशीनें बनाती है। कंपनी की तकनीक से चिप को दूसरे हिस्सों से जोड़ा और पैकेज में बंद किया जाता है। साथ ही जापान की अजीनोमोटो जल्द भारत में एक संयंत्र शुरू करना चाहती है। बता दें कि अजीनोमोटो बिल्ड-अप फिल्म का इस्तेमाल चिप के पैकेज में किया जाता है। यह चिप के अलग-अलग हिस्सों के बीच विद्युत संपर्क से अलग रखने में मदद करती है। इसके अलावा मलेशिया की केलिंगटन सेमीकंडक्टर कारखानों के लिए जरूरी औद्योगिक सुविधाएं तैयार करती है। इसमें विशेष गैस, रसायन और अत्यधिक शुद्ध पानी की आपूर्ति से जुड़ी व्यवस्था शामिल है। असेंडास और फर्स्ट स्पेस कंपनी भी भारत में प्लांट लगाना चाहती है। बता दें कि सिंगापुर की ये कंपनियां औद्योगिक ढांचे और सुविधाओं के विकास में भूमिका निभाएंगी। मकसद चिप से जुड़े कारखानों के लिए जरूरी वातावरण तैयार करेगी। इसी तरह जापान की जेएसआर कंपनी भी भारत में कारोबार शुरू करना चाहती है। बता दें कि जापानी कंपनी ने सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए पहला रोबोट भी विकसित किया है। यह चिप निर्माण के लिए लगे इंजीनियरों का काम खासा आसान और तत्परता से बिना किसी गलती के करता है। इसमें क्लीनरूम सूट खास है जो वहां काम करने वालों को खतरनाक रसायनों के संपर्क में आने से बचाता है साथ ही माइक्रोचिप्स को किसी व्यक्ति से निकलने वाले सूक्ष्म कणों से सुरक्षा देता है।





