रूसी मीडिया ने किया चौंकाने वाला खुलासा, भारत-रूस के नए गठजोड़ से हिल गए कई देश

जनप्रवाद ब्यूरो, नई दिल्ली। रूसी मीडिया ने एक चौंकाने वाली रिपोर्ट जारी की है। इस रिपोर्ट के अनुसार अब भारत की सबसे बड़ी इच्छा पूरी होने जा रही है। भारत और रूस के इस दांव से चीन टेंशन में आ गया है। वहीं अमेरिकी की भी घिग्घी बंध गई है।
ऐतिहासिक दौर में भारत और रूस के संबंध 

भारत और रूस के संबंध अब इतिहास की सबसे ऊंचाईयों जाने वाले हैं। ये संबंध केवल तेल-गैस या हथियार तक सीमित नहीं रहने वाले हैं। रूसी मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार लेनिनग्राद में दोनों देशों के बीच हुई मीटिंग में बड़ा फैसला लिया गया है। रिपोर्ट के अनुसाररूस और भारत के रिश्तों की बात होती है तो सबसे पहले तेल, गैस, मिसाइल और न्यूक्लियर एनर्जी का जिक्र आता है। अब दोनों देशों की दोस्ती एक ऐसे सेक्टर में प्रवेश कर रही है, जिसे आने वाले दशक की असली आर्थिक ताकत माना जा रहा है। दोनों देश मिलकर स्टील के क्षेत्र में काम करेंगे। इससे पुल बनेंगे, बुलेट ट्रेन दौड़ेगी, नई फैक्ट्रियां खड़ी होंगी, रक्षा उपकरण बनेंगे और भारत की 5 ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी का सपना आगे बढ़ेगा। 
स्टील सेक्टर में चीन का लंबे से विवाद

बता दें कि स्टील सेक्टर में चीन का लंबे समय से दबदबा है। अब भारत उनके लिए एक चैलेंजर के तौर पर उभर रहा है। यह एक ऐसा बदलाव है, जिससे बीजिंग को एक अलग तरह की टेंशन सताने लगी है। इस बदलाव की शुरुआत तब हुई जब भारत ने लिथियम और कोबाल्ट से लेकर इलेक्ट्रिक गाड़ियों के लिए सेमीकंडक्टर, डिफेंस सिस्टम और रिन्यूएबल एनर्जी टेक्नोलॉजी पर जोर दिया। इसके के लिए वह घरेलू रिजर्व और विदेशी सप्लाई चेन से प्राप्त रेयर अर्थ एलिमेंट्स को सुरक्षित करने की जुगत में लग गया। रूस से होने वाली डील इस क्षेत्र को और मजबूत करेगी। अगर रूस के साथ भारत का यह सहयोग मजबूत होता है, तो नई सप्लाई चेन तैयार हो सकती है। इसका मतलब होगा कि भारत स्टील और क्रिटिकल मिनरल्स के मामले में चीन पर निर्भरता कम करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। यही वजह है कि इस सहयोग को सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक नजरिए से भी देखा जा रहा है।
सामान्य स्टील नहीं बल्कि स्पेशल स्टील 


भारत और रूस के बीच सिर्फ सामान्य स्टील की बात नहीं हुई बल्कि स्पेशल स्टील, लो-कार्बन टेक्नोलॉजी और क्रिटिकल मिनरल्स पर भी फोकस रहा। स्पेशल स्टील का इस्तेमाल रक्षा उपकरण, युद्धपोत, फाइटर जेट, हाई-स्पीड रेलवे और भारी मशीनरी में होता है। भारत अभी इस क्षेत्र में पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है। रूस के साथ सहयोग से इस गैप को कम करने की कोशिश होगी। इसके अलावा दुनिया अब ग्रीन स्टील और लो-कार्बन इंडस्ट्री की तरफ बढ़ रही है। यूरोप और अमेरिका लगातार कार्बन उत्सर्जन पर सख्त नियम ला रहे हैं। अगर भारत को भविष्य में वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करनी है, तो उसे पर्यावरण-अनुकूल स्टील उत्पादन की तरफ जाना ही होगा। ऐसे में रूस के साथ टेक्नोलॉजी और संयुक्त निवेश पर चर्चा इसी दिशा का हिस्सा मानी जा रही है। यानी यह डील भारत के लिए गेमचेंजर साबित होगी।
लेनिनग्राद ओब्लास्ट प्रशासन में बातचीत

रूस के लेनिनग्राद ओब्लास्ट प्रशासन ने बातचीत में पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स सहयोग पर भी जोर दिया। इसका मतलब यह है कि दोनों देश सिर्फ खरीद-बिक्री नहीं, बल्कि एंड-टू-एंड इंडस्ट्रियल नेटवर्क बनाना चाहते हैं। यानी खदान से लेकर शिपिंग, प्रोसेसिंग और मैन्युफैक्चरिंग तक पूरा सिस्टम एक साथ विकसित करने की योजना बन सकती है। अगर ऐसा होता है तो भारत के स्टील सेक्टर की लागत कम हो सकती है और सप्लाई ज्यादा सुरक्षित बन सकती है। बता दें कि भारत आने वाले वर्षों में खुद को सिर्फ उपभोक्ता बाजार नहीं, बल्कि वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाना चाहता है।  बता दें कि 2025 में शुरू किए गए नेशनल क्रिटिकल मिनरल्स मिशन में भारत तेजी लाना चाहता है। इसका लक्ष्य क्लीन एनर्जी और मैन्युफैक्चरिंग की महत्वाकांक्षाओं को सपोर्ट करने में सक्षम एक इकोसिस्टम विकसित करना है। भारत रूस के बीच यह समझौता इस योजना को भी आगे बढ़ाएगा।